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प्रिंसिस्तान : हाउ नेहरू, पटेल एंड माउंटबेटन मेड इंडिया
By आशुतोष कुमार ठाकुर | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 3/16/2021 4:35:10 PM
प्रिंसिस्तान : हाउ नेहरू, पटेल एंड माउंटबेटन मेड इंडिया

नई दिल्ली: पिछले सदी के मध्य में, भारतीय संघ के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद, देश का प्राय: हरेक कोने से एक अलग राष्ट्र की बात हो रही थी। ऐसा प्रतीत होता है कि, हर एक प्रांत ने एक संप्रभु राष्ट्र घोषित होने की इच्छा जताई थी। हम 2021, में इस बात की, मात्र कल्पना ही कर सकते हैं कि कैसे हमारे देश के ही भीतर के रियासत के प्रतिनिधियों की अलगाववादी योजनाओं को हमारे राष्ट्र निमार्ताओं ने अपनी राजनीतिक समझ और दूरदर्शिता से सफलतापूर्वक सामना किया था।

ये सब बातें और तथ्य हमें अब एक फिक्शन की तरह लगता है, जबकि यह हमारे देश के अतीत का महत्वपूर्ण खंड है। संदीप बामजई की पुस्तक 'प्रिंसिस्तान' इसी बीते हुए समय के यथार्थ को बयां करती है। लेखक संदीप बामजई इन 'अनेकडॉट्स' का जिक्र भर करते हुए उसके बिनाह पर जो वितान रचते हैं, जो वैचारिक दस्तावेज हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं, विमशरें की जिन दरिया में हमें उतारते हैं, वह आज के समय की जरुरत है।

इस पुस्तक की सुंदरता लेखक की ईमानदार और निष्पक्ष दृष्टिकोण में है, जो एक अद्भुत लेखन शैली के साथ मिश्रित है। हर एक छोटे-बड़े आख्यानों का वर्णन करते हुए लेखक ने जो संवेदनशीलता और विचारशीलता दिखाई है, वह कबीलेतारीफ है। 'प्रिंसिस्तान' मुख्य रूप से एक राजनीतिक इतिहास की किताब है, जिसे लेखक संदीप बामजई, स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत में हुई प्रमुख घटनाओं और राजनीतिक और सामाजिक परि²श्य पर उसके प्रभावों को खूबसूरती से रेखांकित करते हैं।

भारत की आजादी के बाद 'भारत बनने की कहानी' पर कई बेहतरीन पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। इन्हीं पुस्तकों की सूची में संदीप बामजई की पुस्तक 'प्रिंसिस्तान' का नाम भी जुड़ गया है। 'प्रिंसिस्तान' को अगर 247 पृष्ठों का ऐतिहासिक दस्तावेज कहा जाये, तो गलत नहीं होगा। दरअसल, इस किताब में बताया गया है कि कैसे 565 रियासतों जिन्हें 'प्रिंसिस्तान' का नाम दिया गया, को दो स्वतंत्र राज्यों भारत और पाकिस्तान के दायरे से बाहर रखने की साजिश को जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और लॉर्ड माउंटबेटन ने नाकाम किया।

विचार यह था कि 'प्रिंसिस्तान' नामक एक तीसरा प्रभुत्व बनाया जाए जहां 565 रियासतें दो स्वतंत्र राज्यों के दायरे से बाहर रहेंगी और अंग्रेजों के सहयोग से यह एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्थापित होगी। इस तरह के विभाजनकारी योजना ने नव स्वतंत्र राष्ट्र को अस्थिर और कमजोर बना दिया था। यह जानना वाकई दिलचस्प है कि, कैसे तीन व्यक्ति ने नव स्वतंत्र राष्ट्र भारत को बेलगाम करने की नापाक ब्रिटिश योजना के रास्ते में खड़े थे। जवाहरलाल नेहरू, लॉर्ड माउंटबेटन और सरदार पटेल ने हर मोड़ पर रियासतों के शासकों से लड़ाई लड़ी और उस धूर्त योजना को नाकाम किया था।

संदीप बामजई हमें पुस्तक के माध्यम से विस्तार और बारीकी से बताते हैं कि कैसे 'प्रिंसिस्तान' का गठन हुआ। यह एक गहन शोध और रागात्मक भाव से लिखी गयी पुस्तक है। वह विभिन्न स्रोतों - पत्रों, संस्मरणों, आत्मकथाओं, समाचार रिपोटरें और अपने व्यक्तिगत अनुभवों से वह इस पूरे वितान को हमारे समक्ष लाते हैं।

ऑल इंडिया स्टेट्स कॉन्फ्रेंस का संगठन नेहरू की महत्वाकांक्षी योजना थी। नेहरू ने गांधी को साधिकार आग्रह किया और कहा कि हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी रियासतें भारत संघ के साथ हों। नेहरू की परवरिश, उनकी विचार प्रक्रिया शुरू से ही साम्राज्य/राजशाही विरोधी थी। नेहरू कभी भी राजकुमारों को पसंद नहीं करते थे और उनका यह विचार उनके राजतंत्रीय विरोधी अवधारणा और फैबियन समाजवादी सोच से उपजा था।

नेहरू एक संपूर्ण एकीकृत भारत की अवधारणा पर विश्वास करते थे, जिसमें प्रांत और रियासतें शामिल थीं। नेहरू के सम्राज्यवाद विरोधी स्वभाव, पटेल की चतुराई और गांधीजी के एक आकार रहित भारत का विश्वास जिसमें वह चाहते थे कि लोग सह-अस्तित्व में रहें, लेखक किताब में आख्यान को हवाला देते हुए बताते हैं।

दस्तावेज को पढ़ते और लिपिबद्ध करते समय लेखक संदीप बामजई का ²ष्टिकोण और व्यवहारिकता दोनों में संतुलन है, जिसका प्रमाण इस पुस्तक में दृष्टिगत होता है। भारत को एक करने का अभूतपूर्व कार्य जिसमें हर नीति का प्रयोग किया गया, इस पुस्तक में दर्ज है जिसे पढ़ते हुए आपको इससे एक भावात्मक राग सा जुड़ाव लगेगा।

तत्कालीन रियासत भारत राष्ट्र में विलय के लिए सहज नहीं थे। आजाद भारत में शामिल होने के संबंध में रियासत के साथ कई संवाद हुए और अधिक अवसरों पर राजाओं ने अपने सवतंत्र अस्तित्व के पक्ष में पर जीत हासिल की थी। लार्ड माउंटबेटन ने तत्कालीन रियासत के राजाओं को बहुत स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा कि 15 अगस्त 1947 के बाद कोई अन्य तरीका नहीं है, अगर आप सोच रहे हैं कि आप छोटे-छोटे रियासत का निर्माण करेंगे और जिसे ब्रिटिश हुकूमत समर्थन करेगी, जो कि असंभव है। और ठीक यहीं 'प्रिंसिस्तान' की अवधारणा का बीजारोपण होता है।

लेखक संदीप बामजई विस्तार से बताते हैं रियासत कभी भी स्वतंत्रता नहीं चाहते थे। इन रियासतों का एक चैंबर था और चैंबर ऑफ प्रिसेंस के चांसलर भोपाल के नवाब हमीद़ल्लाह खान थे। तत्कालीन राजाओं ने काफी हद तक खुद को हिंदुस्तान और पाकिस्तान के मसले से लंबे समय तक बाहर रहने में कामयाबी भी हासिल कर ली थी। परन्तु पंडित नेहरू, सरदार पटेल और लॉर्ड माउंटबेंटन ने उनके इस विभाजक मंसूबों पर पानी फेर दिया। भारत को अस्थिर और कमजोर करने के मिशन में इन रियासतों का साथ जिन्ना, लॉर्ड वेवेल और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने भरपूर दिया था।

आगे, संदीप बामजई किताब में लिखते हैं: पटेल ने मेनन से पूछा कि क्या आप देख रहे हैं? सरदार पटेल ने मेनन से यह भी पूछा, क्या माउंटबेटन एक टोकरी में सभी 565 सेब लाएंगे और उसे रख देंगे?

मेनन, पटेल के प्रश्न का सकारात्मक उत्तर देते हैं, और पटेल अंगूठे को ऊपर कर सहमति देते हैं। और इसी प्रकार भारत का निर्माण होता है। मेनन ने इन रियासतदारों को साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाकर अपनी ओर मिलाया।

यह एक कहानी की तरह पाठक को 1947 के उस काल खंड में ले जाती है जहां यह सब घटित हो रहा था। वीपी मेनन एक दृढ सोच वाले नौकरशाह थे, जिन्होंने पहले माउंटबेटन के साथ काम किया था। उन्होंने ओडिशा से भावनगर तक लंबी यात्रा की थी। मेनन शिमला जाते हैं, डिकी बर्ड योजना पर काम करते हैं, नेहरू उस योजना की पुष्टि करते हैं, और अंतत: माउंटबेटन उस योजना को मंजूरी देते हैं। आपको पढ़ते हुए यह एहसास होगा कि, 565 टुकड़ों को एक सूत्र में पिरोने की ये कहानी राजनीतिक पुस्तक की तरह एक खास वर्ग के लिए नहीं लिखी गई है। लेखक ने वी.पी. मेनन के योगदान का शानदार वर्णन किया है। यह पुस्तक निश्चित रूप से एक खास वर्ग को आइना दिखने का भी काम करती है, जो पटेल और नेहरू के मध्य वैचारिक दीवार खड़ा कर रही है।

संदीप बामजई ने अपने इस किताब के माध्यम से भारत के एक आजादी के तुरंत बाद की स्तिथि को कथात्मक इतिहास के रूप में प्रस्तुत करने का एक शानदार काम किया है। साथ ही साथ भारतीय राष्ट्र-राज्य की संकल्पना और निर्माण कथाओं को भी अपने अर्जित भाषा शिल्प और पत्रकारिता के विराट अनुभवों के माध्यम से हमारे समक्ष लाते हैं।

वर्तमान समय में बहुत कम ही ऐसे सन्दर्भ पुस्तक लिखी जा रही है, जैसा संदीप बामजई ने लिखा है। यह हमारे बुक शेल्व्स में रहने वाली अनिवार्य पुस्तक है। संदीप की यह उत्कृष्ट कृति को लंबे समय तक याद किया जाएगा।

पुस्तक : प्रिंसिस्तान : हाउ नेहरू, पटेल एंड माउंटबेटन मेड इंडिया

लेखक : संदीप बामजई

प्रकाशक: रूपा एंड को

भाषा: अंग्रेजी

मूल्य : रु 395

(समीक्षक, आशुतोष कुमार ठाकुर बैंगलोर में रहते हैं। पेशे से मैनेजमेंट कंसलटेंट तथा कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल के सलाहकार हैं)

Tags:

भारतीय संघ,अस्तित्व,हरेक,प्रतीत,संप्रभु,राष्ट्र,घोषित,प्रिंसिस्तान,संदीप बामजई,

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