Thursday 21 November 2019, 07:40 PM
1946 का नौसेना विद्रोह उखाड़े जिसने अंग्रेजों के पांव
By डॉ. अजीत जावेद | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 5/27/2019 3:18:07 PM
1946 का नौसेना विद्रोह उखाड़े जिसने अंग्रेजों के पांव
नौसेना विद्रोह की याद में कोलाबा, मुंबई में बना स्मारक

(यह लेख इतिहास के कुछ उन पन्नों को उजागर कर रहा है जो आजादी की लड़ाई से ताल्लुक रखते हैं लेकिन राजनीतिक या कुछ अनकहे कारणों से उन पर ज्यादा रोशनी नहीं डाली गई। इन पन्नों में 1946 में हुई नौसेना की एक बगावत का जिक्र है। उस बगावत ने आजादी के राजनीतिक आंदोलन के समानांतर एक अलग माहौल पैदा किया। उस माहौल ने अंग्रेजों को अंदर तक भयभीत कर दिया था। अंग्रेज नागरिक आंदोलन से तो कुछ और वर्षों तक निपट भी सकते थे लेकिन नौसैनिकों के विद्रोह ने उन्हें भारत छोड़ने का निर्णय जल्दी लेने पर मजबूर कर दिया। इस विद्रोह ने अंग्रेजों को यह एहसास करा दिया कि यदि और अधिक समय तक वे भारत में टिके रहे तो वापस ब्रिटेन भागने का रास्ता भी बंद हो जाएगा। दुर्भाग्य से इस ऐतिहासिक विद्रोह को इतिहास की पुस्तकों में कोई विशेष स्थान नहीं मिला। -सं.)

कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पीवी चक्रवर्ती ने 30 मार्च, 1976 के अपने पत्र में लिखा है, '1956 में जब मैं पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में कार्यरत था तो ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री लॉर्ड क्लीमैंट एटली कोलकाता के राजभवन आए थे और दो दिनों तक रहे थे। मैंने उनसे सीधा सवाल किया था कि महात्मा गंाधी का भारत छोड़ो आंदोलन 1947 के काफी पहले कमजोर पड़ गया था और उस समय ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके चलते ब्रिटिश राज को भारत से जल्दी जाने का फैसला लेना पड़े। फिर वह क्या था जिसने अंग्रेजों को ऐसा करने पर मजबूर किया? जवाब में एटली ने कई कारण गिनाए लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण कारण उन्होंने बताए, वे थे- सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज की गतिविधियां जिन्होंने अंगे्रजी हुकूमत की जड़ें हिला दीं और 1946 का नौसेना विद्रोह जिसने उन्हें यह अहसास करा दिया कि हिन्दुस्तानी फौज पर अब भरोसा नहीं किया जा सकता है।'

इस स्वीकारोक्ति से यह जाहिर होता है कि नौसैनिकों के विद्रोह ने ब्रिटिश राज को वह निर्णय जल्दी लेने पर बाध्य कर दिया जिसके लिए स्वतंत्रता संग्राम छेड़ा गया था यानी हिन्दुस्तानियों की हुकूमत हिन्दुस्तानियों के हाथ। हालांकि 1942 से 1946 के बीच नौसेना में बगावत के सुर 19 बार छेड़े गए थे लेकिन 1946 का सुर सबसे तेज था। इस विद्रोह की शुरुआत मुंबई में 18 फरवरी, 1946 को हुई थी। ब्रिटिश भारतीय युद्धपोत 'एचएमएस तलवार' के नाविकों व नौसैनिकों ने जो उस समय मुंबई बंदरगाह पर तैनात थे, हड़ताल कर दी थी। उनकी हड़ताल का कारण था, उन्हें दिया जाने वाला खाना जो उनके मुताबिक खराब व गंदा था। वे एक अंग्रेज ड्यूटी अफसर के पास गए और खराब खाने की शिकायत की। उनकी शिकायत दूर करने के बजाय उसने सख्त लहजे में कहा कि भिखारियों के पास चुनने का अधिकार नहीं होता। उसने उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां दीं। अपने साथ हुए ऐसे व्यवहार से नौसैनिक गुस्से में आ गए। हालांकि ऐसा उनके साथ पहले भी होता था और अपमान सहना पड़ता था लेकिन अब ब्रिटिश हुकूमत की तरफ से कई लड़ाइयां लड़ने के बाद उनमें आत्म-विश्वास आ गया था और उनके सोचने का नजरिया बदल गया था। विश्व में उनकी बहादुरी के चर्चे भी कम न थे।

कई देशों को फासियों से आजादी हासिल करने में मदद करने के दौरान उन्होंने उनका स्वाधीनता संग्राम भी देखा था। कई नौसैनिक द्वितीय विश्व युद्ध के समय नौसेना में भर्ती हुए थे और देश के अलग-अलग कोनों से आए थे। उन्होंने आजाद हिन्द फौज का संघर्ष भी देखा था। लिहाजा, जो लोग कहते हैं कि 1946 का नौसैनिक विद्रोह ब्रिटिश सामाज्यवाद के खिलाफ नहीं था, वे यह नहीं देख पाते हैं कि देश में चल रही आजादी की लड़ाई ने उन पर भी असर डाला क्योंकि वे भी उतना ही अपमान और शोषण झेल रहे थे। उनमें आई राजनीतिक जागरूकता ने इस लड़ाई में उन्हें भी अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया। इसके पीछे सुविचारित प्रयास था। नतीजतन, नौसैनिक हड़ताल पर चले गए। उन्होंने उस अंग्रेज अफसर के खिलाफ कार्रवाई की मांग की जिसने उन्हें अपमानित किया था। 

इसके अलावा, उन्होंने 17 वर्षीय नौसैनिक बीसी दत्त को भी रिहा करने की मांग रखी, जिसे जहाज पर आजाद हिन्द फौज का नारा लिखने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था। अधिकारियों ने उनकी मांगें मानने से इनकार कर दिया। हड़ताल और फैलने लगी। महज 48 घंटे में वहां खड़े और समुद्र में जा रहे जहाजों पर हड़ताल हो गई। सभी 74 जहाजों, चार बेड़ों और 20 नौसैनिक संस्थानों के लोग हड़ताल में शामिल हो गए। नौसैनिकों ने जहाजों से ब्रिटिश झंडा उतार दिया और कांग्रेस (तिरंगा), मुस्लिम लीग (चांद) और कम्युनिस्ट पार्टी (हँसिया-हथौड़ा) के झंडे फहराए दिए। 

नौसैनिकों ने हड़ताल का नेतृत्व करने के लिए एक समिति बनाई। सिगनलर एम एस खान को उस समिति का अध्यक्ष और टेलीग्राफिस्ट मदन सिंह को उपाध्यक्ष चुना गया। समिति के अन्य सदस्य थे- बेदी बसंत सिंह, एससी सेन, मास्टर नवाज, अशरफ खान, स्टोकर गोमेज और मुहम्मद हुसैन। समिति ने रॉयल इंडियन नेवी का नाम बदल कर इंडियन नेशनल नेवी रख दिया। उन्होंने एक मांग-पत्र भी तैयार किया जिसमें आर्थिक मांगों के साथ-साथ राजनीतिक कैदियों (उनमें आजाद हिन्द फौज के कैदी भी शामिल थे), की रिहाई की मांग भी रखी गई। यह भी मांग की गई कि भारतीय फौज को इंडोनेशिया और यूनान से वापस बुला लिया जाए।

एम एस खान ने माइक के जरिए इन मांगों की घोषणा की। सबने खूब उत्साह दिखाया और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ नारे भी लगाए। समिति ने कुछ नौसैनिकों को तीनों झंडे लेकर मुंबई शहर में भेजा ताकि शहरवासी उनकी तकलीफों को जान सकें और उनके संघर्ष में उनकी मदद करें। हड़ताल की खबर जंगल की आग की तरह पूरी मुंबई में फैल गई। लोगों ने उनका स्वागत किया और राष्ट्रीय एकता के नारे लगाए। उन पर लोगों ने फूल बरसाए और उन्हें खाने-पीने की चीजें दीं। हिन्दू, मुस्लिम और पारसी दुकानदारों ने नौसेना के जवानों को लेकर जुलूस निकाला और उन्हें लेकर गलियों, खास तौर से कोलाबा और फोर्ट एरिया, में घूमे। 20 फरवरी को सेना की अलग-अलग यूनिटों, पुलिस के जवानों, विद्यार्थियों और मजदूर संगठनों ने भी सहानुभूति प्रकट करते हुए हड़ताल की।

रॉयल इंडियन एयर फोर्स के 1200 जवानों ने उनकी हड़ताल के समर्थन में जुलूस निकाला। नेवल अकाउंट विभाग का सिविलियन स्टाफ भी हड़ताल पर चला गया। वायु सेना के भारतीय अधिकारियों और ट्रांसपोर्ट यूनिट ने नौसैनिकों के खिलाफ सैन्य टुकड़ी ले जाने से मना कर दिया। वायु सेना के अधिकारियों ने उन जहाजों को उड़ाने से मना कर दिया जो हड़ताली जहाजों पर बम गिराने के लिए उड़ाए जाने थे। 

कुछ समय बाद ऐसा लगने लगा कि मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है और आर्थिक मांगें पार्श्व में चली गई हैं। नौसैनिकों ने अपनी बैठकों में मुहम्मद इकबाल की उन नज्मों को भी पढ़ा जिनमें उन्होंने गरीबों व दलितों का जिक्र किया था। यह लोगों को अपने पर हो रहे जुल्म और उत्पीड़न के खिलाफ उठ खड़े होने और उत्पीड़कों से लड़ने का आह्वान था। अंग्रेजी हुकूमत ने जब देखा कि लोग इनके समर्थन में आ गए हैं तो उसे घबराहट होने लगी। मुख्य कमांडर गॉडफ्रे ने नौसैनिकों को चेतावनी दी कि उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। ब्रिटेन में लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री एटली ने भी अपनी सहमति दी और संसद में धमकी देते हुए कहा कि इस बगावत को कुचलने के लिए ब्रिटिश पोत भेजे जा रहे हैं। भारत की अंग्रेजी हुकूमत ने बगावत कुचलने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। भारतीय सैनिकों को हटा दिया गया। नौसैनिकों पर मशीनगनों से गोलियां चलाई गईं। नौसैनिकों ने भी गोलियां चलाईं।

'एचएमएस तलवार' से साम्राज्यवादियों के खिलाफ उठी आवाज मुंबई तक ही सीमित नहीं रही। देश के विभिन्न भागों में स्थित नौसेना संस्थानों व पोतों तक यह आग पहुंच गई। हड़ताल की खबर 19 फरवरी को कराची पहुंची। चमक बंदरगाह में खड़े दो युद्धपोतों पर भी हड़ताल हो गई। 20 फरवरी को नौसनिकों ने जहाजों से सभी अधिकारियों, चाहे वे अंग्रेज हों या भारतीय, को हटा दिया और पोतों पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया। 'हिन्दुस्तान जिन्दाबाद', 'ब्रिटिश साम्राज्यवाद हाय-हाय', 'आजादी के लिए खून दो', 'जालिमों, तुम्हारे दिन लद गए हैं', जैसे नारे लगने लगे और दीवारें नारों से पट गईं। विद्रोही मनोरा की गलियों में ब्रिटिश विरोधी नारे लगाते निकले।

वहां के लोगों ने भी उनका साथ दिया। जब विद्रोहियों का दल युद्धपोत 'हिन्दुस्तान' की तरफ जाने लगा तो सेना के जनरल ने बलूच सैनिकों की एक टुकड़ी भेजी। जब बलूचों ने अपने भाइयों पर गोली चलाने से मना कर दिया तो सरकार घबरा गई। इसके बाद अंग्रेज सैनिकों को बुलाया गया जिन्होंने विद्रोहियों पर गोलियां चलाईं। दोनों तरफ से चार घंटे तक गोलियां चलती रहीं। छह विद्रोही मारे गए और 30 घायल हो गए। विद्रोहियों की गोलियां निशाने पर नहीं लग रही थीं। उनके पास समर्पण के अलावा कोई चारा नहीं था। उन्होंने एक लड़के को सफेद झंडा लेकर पुल पर भेजा लेकिन अंग्रेजों ने उसे भी मार दिया। उन्होंने 'हिन्दुस्तान' पर कब्जा कर लिया और सभी नौसैनिकों को गिरफ्तार कर लिया।

इसके विरोध में कराची में 24 फरवरी को पूरी तरह से हड़ताल रही। लगभग 30,000 लोग धारा 144 के बावजूद ईदगाह मैदान में जमा हुए। लोगों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं। इसमें 25 से अधिक लोग घायल हो गए। ब्रिटिश पैराट्रूपर्स ने मनोरा टापू पर भी कब्जा कर लिया। अनिल राय, हीरा लाल और अकबर अली का कोर्ट मार्शल किए जाने के आदेश जारी हुए। 18 साल के लड़कों पेटी अफसर अब्दुल बाकी (अजमेर) और मुबारक अहमद (कराची) को सरगना माना गया और उनके लिए भी कोर्ट मार्शल के आदेश जारी किए गए। 

'काठियावाड़' के बहादुर

नौसैनिकों की इस हड़ताल ने हर किसी को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जगाने का काम किया। कुछ ने इसलिए विद्रोह किया क्योंकि वे मुंबई और कराची में अपने साथियों की मदद करना चाहते थे। गुजरात के मोरवी राज के एक जहाज 'काठियावाड़' ने गजब की बहादुरी दिखाई। 21 फरवरी को जैसे ही यह जहाज मुंबई के लिए चला तो उन्हें संदेश मिला कि कराची में 'हिन्दुस्तान' के सैनिकों पर संकट आ गया है। संदेश मिलते ही इस पर सवार 120 नौसैनिक जिनका नेतृत्व नाविक अब्दुल करीम कर रहे थे, हरकत में आ गए और उन्होंने अपने कैप्टन को एक कमरे में बंद कर दिया, जहाज को अपने नियंत्रण में ले लिया, खुद को हथियारों से लैस किया और 'हिन्दुस्तान' जहाज के अपने भाइयों की मदद के लिए कराची की तरफ निकल पड़े। जब तक वे कराची पहुंचते, उन्हें खबर मिली कि वहां के सैनिकों ने समर्पण कर दिया है। 'काठियावाड़' को फिर मुंबई की तरफ मोड़ दिया गया। अब वे मुंबई में अपने साथियों की मदद करना चाहते थे। लेकिन जब तक वे वहां पहुंचते, खबर मिली कि वहां भी लोगों ने समर्पण कर दिया है। इस तरह भारतीय नौसैनिकों के नियंत्रण वाला जहाज अपनी बहादुरी के अंजाम तक पहुंचने से वंचित रह गया। 

विद्रोह का समर्थन

कोलकाता में नौसैनिक अड्डे एचएमआईएस हुगली के नौसैनिक 22 फरवरी को हड़ताल पर चले गए। मुंबई और कराची के समर्पण के बाद भी उनकी हड़ताल जारी रही। उन्होंने नौसैनिकों के दमन की खूब आलोचना की। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) के आह्वान पर एक लाख मजदूर भी हड़ताल में शामिल हुए। जब अंग्रेजों ने चारों तरफ से नौसैनिकों को घेर लिया और उन्हें बंदी बना लिया तो यह हड़ताल खत्म हो गई। हड़ताल 26 फरवरी को खत्म हुई।

उधर, मद्रास (चेन्नै) में एचएमआईएस अडयार और विशाखापतनम में सोनावती व अहमदाबाद के नौसैनिकों ने भी शहर में जुलूस निकाला। उनके हाथ में भारतीय झंडा था और वे 'इंकलाब जिन्दाबाद' के नारे लगा रहे थे। 25 फरवरी को मद्रास में पूरी तरह हड़ताल थी। जबलपुर, असम और दिल्ली में भी हड़तालें हुईं। हालांकि सीपीआई को छोड़ कर अन्य दलों ने समर्थन नहीं किया लेकिन लोगों ने इसे भरपूर समर्थन दिया। इस पूरे 'विद्रोह' में हर धर्म, हर वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया था।

समर्पण:

जब नौसैनिकों को देश के विभिन्न राजनीतिक दलों से कोई समर्थन नहीं मिला और उनके प्रति अंगे्रजी हुकूमत का दमन बढ़ने लगा तो हड़ताल समिति ने और खून-खराबा रोकने की मंशा से हड़ताल वापस ले ली। नौसैनिकों ने गुस्से और लाचारी में समर्पण कर दिया। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि वे भारतीयों के सामने समर्पण कर रहे हैं न कि अंग्रेजों के सामने। समिति अध्यक्ष एम एस खान ने अपने आखिरी संदेश में कहा, 'हमारी हड़ताल हमारे देश के जीवन की एक ऐतिहासिक घटना है। पहली बार सैनिकों व नागरिकों का खून एक आम मकसद के लिए एक साथ बहा है। हमें नहीं पता कि ये हमें कहां ले जा रहे हैं। हम कभी भी हार नहीं मानेंगे। अलविदा।'

कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने नौसैनिकों के विद्रोह से खुद को अलग तो नहीं बताया लेकिन उनकी किसी तरह से मदद भी नहीं की। उन्होंने नौसैनिकों को समर्पण करने की सलाह दी। एचएमएस तलवार के रेडियो ऑपरेटर जे एल बेदी ने अपने संस्मरण में कहा है कि 23 फरवरी को जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना उन लोगों से मिलने उनके जहाज पर आए थे। जवाहर लाल ने कहा, 'तुम लोग बहादुर हो, नौजवान हो, निर्दोष हो, जो हुआ उसे तुम लोग भूलने की कोशिश करो। मेस के प्रभारी ब्रिटिश अधिकारी का तबादला कर दिया गया है। हमें अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि तुममे से किसी को परेशान व तंग नहीं किया जाएगा। तुमसे अनुरोध है कि तुम समर्पण कर दो क्योंकि तुम्हारे परिवारजनों को नुकसान पहुंच सकता है।' 

जवाहर लाल द्वारा दी गई अप्रत्यक्ष धमकी ने उन पर बिजली गिराने का ही काम किया। बेदी आगे कहते हैं, 'जवाहर लाल की धमकी सुनते ही मैं, अब्दुल वाहिद और थॉमस डिसूजा आगे निकल कर आए। मैं चिल्ला पड़ा, आप भी उन अंग्रेजों की ही भाषा बोल रहे हैं कि समर्पण कर दो। आपका इन गोरों से क्या संबंध है?' यह सुन कर जवाहर लाल को सांप सूंघ गया। जिन्ना चेहरा घुमा कर हंसने लगे। इन बड़े नेताओं के रवैये ने नौसैनिकों को बहुत ही निराश किया। उन्हें लगा कि उन्हें छला गया है। मुंबई में 23 फरवरी को ही करीब 400 नौसैनिक गिरफ्तार हुए थे और कराची में 500 के करीब नौसैनिकों को हिरासत में लिया गया था। इन गिरफ्तारियों की कोई सरकारी पुष्टि नहीं हो पाई। बाद में इस विद्रोह की जांच के लिए एक आयोग बिठाया गया जिसने 600 पन्नों की एक रिपोर्ट भी दी लेकिन उसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। 

लेकिन, इन बहादुर सैनिकों ने अंग्रेजी सरकार की जड़ें हिला दीं, उनकी नींद हराम कर दीं। उन्हें अहसास हो गया कि अब हिन्दुस्तान में उनके दिन लद गए हैं और उन्हें जितनी जल्दी हो सके, हिन्दुस्तान से चले जाना चाहिए। अंग्रेजों के दमन के विरोध में नौसैनिकों द्वारा डटकर खड़े होने की हिम्मत की याद दिलाता है मुंबई के कोलाबा में बना स्मारक, जिसे भारतीय नौसेना ने 2002 में बनवाया।

नौसैनिक विद्रोह के हालात पर शायर साहिर लुधियानवी ने अपनी नज्म में उस पीड़ा का वर्णन किया था

ये किसका लहू है

ये किसका लहू है कौन मरा...

ऐ रहबरे-मुल्को-कौम बता

आंखें तो उठा नजरें तो मिला

कुछ हम भी सुनें हमको भी बता

ये किसका लहू है कौन मरा...


धरती की सुलगती छाती पर 

बेचैन शरारे पूछते हैं

हमलोग जिन्हें अपना न सके

वे खून के धारे पूछते हैं

सड़कों की जुबां चिल्लाती है

सागर के किनारे पूछते हैं

ये किसका लहू है कौन मरा...


ऐ अज्मे-फना देने वालों

पैगामे वफा देने वालों

अब आग से क्यूं कतराते हो

मौजों को हवा देने वालों

तूफान से अब क्यूं डरते हो

शोलों को हवा देने वालों 

क्या भूल गए अपना नारा

ये किसका लहू है कौन मरा...


हम ठान चुके हैं अब जी में

हर जालिम से टकराएंगे

तुम समझौते की आस रखो

हम आगे बढ़ते जाएंगे

हम मंजिले-आजादी की कसम

हर मंजिल पे दोहराएंगे

ये किसका लहू है कौन मरा... 

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कोलकाता,न्यायालय,न्यायाधीश,प्रधानमंत्री,गतिविधियां,क्लीमैंट

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