Wednesday 13 November 2019, 01:10 PM
कहानी पर्वत और तूफान की
By रियर एडमिरल विजय एस. चौधरीं(सेनि) | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 5/25/2019 4:07:26 PM
कहानी पर्वत और तूफान की
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1972 में पहले स्वदेशी जंगी पोत नीलगिरि का उद्घाटन किया।

कहानी मारुत यानी तूफान से शुरू होती है और नीलगिरि यानी पर्वत तक जाती है। यह तूफान वायु सेना के स्वदेशी विमान मारुत के विकास के साथ खड़ा हुआ और नाकामयाबी के भंवर में भटक गया जबकि नीलगिरि वर्ग के जंगी पोतों की विकास यात्रा किसी पर्वत की तरह अटल रही और मंजिल तक पहुंच गई। इस लेख में स्वदेशीकरण के इन दो पहलुओं को उजागर किया गया है। देश के रक्षा उद्योग के स्वदेशीकरण को समझने के लिए दो परियोजनाओं के इतिहास पर नजर डालनी होगी। एक परियोजना है एचएफ-24 मारुत जेट फाइटर की। और दूसरी है लिएंडर क्लास के युद्ध पोतों के निर्माण की। एचएफ-24 मारुत जेट फाइटर की योजना पचास के दशक में शुरू हुई थी। वह विमान अपने दौर के सर्वश्रेष्ठ विमानों की कतार में था। उसे डिजाइन करने वाले डॉ कुर्ट टैंक उस वक्त दुनिया के सर्वश्रेष्ठ डिजाइनर थे। दुर्भाग्य से उसके लिए जो इंजन सोचा गया था, उसे ब्रिटेन ने बनाना बंद कर दिया। इस परियोजना को समर्थन नहीं मिल पाया और हमने विदेशी विमानों को खरीदना शुरू कर दिया, जो आज तक जारी है। इसके विपरीत लिएंडर क्लास के जैसे युद्धपोत बनाने का न तो अनुभव हमारे पास था और न तकनीक थी। पर नीलगिरि परियोजना सौभाग्यशाली रही। हर सदमे के बाद कोई न कोई सुधार हुआ, जबकि मारुत में हर सदमे ने एक कीमत वसूली। अंत में रवैया महत्वपूर्ण साबित हुआ। एक स्थिति के बाद वायुसेना ने हार मान ली या यूं कहें कि विदेशी विमानों की ओर रुझान बढ़ता गया लेकिन नौ सेना स्वदेशीकरण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए डटी रही और कामयाब रही। 

आजादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में भारत सरकार ने देश को शक्तिशाली और आत्मनिर्भर बनाने का बीड़ा उठाया था। सन 1948 में ही नेहरू ने नाभिकीय हथियारों के विकास की योजना बनाई थी और भारत के आणविक ऊर्जा आयोग की स्थापना की। सन 1962 में डॉ. विक्रम साराभाई के नेतृत्व में इंडियन नेशनल कमिटी फॉर स्पेस रिसर्च (इनकोस्पार) की स्थापना की गई। स्वतंत्रता के बाद के पहले दशक में अनेक दूसरे कार्यक्रम शुरू किए गए और अनेक संस्थाएं बनीं। 

भारतीय रक्षा उद्योग की दशा-दिशा को समझने के लिए दो परियोजनाएं खासतौर से महत्वपूर्ण हैं। देश के लिए एक, आधुनिक जेट फाइटर के डिजाइन व निर्माण और दूसरे, भारतीय नौसेना के लिए आधुनिक फ्रिगेट बनाने की परियोजनाएं। दोनों की सीधी तुलना सम्भव नहीं है। दोनों अलग-अलग क्षेत्रों की परियोजनाएं थीं। एक विमानन की और दूसरी पोत निर्माण की। दोनों के तरीके अलग-अलग होने ही थे। दोनों परियोजनाएं अलग-अलग दशकों में शुरू की गईं। दोनों परियोजनाओं के परिणाम विचारणीय हैं और भविष्य के लिए पाठ भी। 

1950 के दशक के मध्य में भारतीय वायु सेना ने आत्म-निर्भरता के लिहाज से बहुद्देश्यीय फाइटर एयरक्राफ्ट की जरूरत पेश की। नाम रखा गया एचएफ-24 मारुत। किसी भी दृष्टि से यह महत्वाकांक्षी योजना थी, क्योंकि बड़ी ताकतों से इतर किसी देश द्वारा एक उन्नत किस्म का विमान बनाने की यह पहली कोशिश थी। यह एक लम्बी छलांग थी, क्योंकि इसके पहले भारतीय विमानन उद्योग के पास सिंगल प्रोपेलर और पिस्टन इंजन के सहारे उड़ने वाले एचटी-2 ट्रेनर विमान का डिजाइन तैयार करने का अनुभव ही था। उस वक्त विमान निर्माण की काबिलियत भी साधारण ही थी। हमारे यहाँ लाइसेंस पर ही हैवीलैंड वैम्पायर एफबी मार्क 52 और टी मार्क 55 बनाने की सीमित सामर्थ्य थी। वैम्पायर ब्रिटेन की शाही वायुसेना में शामिल दूसरा जेट फाइटर था और वह उस दर्जे का विमान नहीं था, जिस दर्जे का विमान मारुत होता। उसमें मोल्डेड प्लाइवुड और अल्युमीनियम का ढाँचा (फ्यूजलेज) था और उसकी स्पीड 500 मील प्रति घंटा थी। 

मारुत के लिए तय मानदंड एलसीए से बेहतर थे 

स्वदेशी एचएफ-24 मारुत लड़ाकू विमान: एक महत्वाकांक्षी योजना का उत्कर्ष तक पहुंचने से पहले हुआ अंत। 

 

मारुत विमान के लिए एयर स्टाफ रिक्वायरमेंट (एएसआर) हाई एल्टीट्यूड इंटरसेप्शन और लो-लेवल ग्राउंड अटैक में समर्थ मल्टी रोल एयरक्राफ्ट की थी। इसके अंर्तगत 60,000 फुट (18,290 मीटर) की ऊँचाई पर मैक-2 की स्पीड और 500 मील (805 किलोमीटर) का कॉम्बैट रेडियस होता। इसके अलावा यह जरूरत भी दर्शाई गई थी कि उसका बेसिक डिजाइन ऐसा हो जिसे एडवांस ट्रेनर के रूप में बदला जा सके, वह हर किस्म के मौसम में काम करने वाला एडवांस फाइटर रहे और शिपबोर्ड एयरक्राफ्ट भी बने जिसका इस्तेमाल नौसैनिक कर सकें। इस विमान का विकास भारत में ही होना था। इन जरूरतों को समझने के लिए इस एएसआर की तुलना इसके तीन दशक बाद एलसीए तेजस के 1985 में बनाए एएसआर से की जानी चाहिए। 

एलसीए का प्रदर्शन 

अधिकतम गति : मैक 1.8 (1,920 किमी प्रति घंटा)

रेंज          : 850 किलोमीटर

कॉम्बैट रेडियस : 300 किमी (186 मील)

ऊँचाई : 15,250 मीटर (50,000 फुट)

हिन्दुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड (अब एचएएल, बेंगलुरु) के सामने इस एएसआर को हासिल करने की जिम्मेदारी थी। यह काम एचएएल की सीमित तकनीकी सामर्थ्य के बाहर था, इसलिए सरकार ने अनुभवी विदेशी डिजाइनर को लाने का समझदारी भरा फैसला किया। डॉ. कुर्ट टैंक के रूप में उसे इस काम के लिए सही व्यक्ति मिल भी गया। कुर्ट वॉल्डेमर टैंक (24 फरवरी, 1898-5 जून, 1983) जर्मन एरोनॉटिकल इंजीनियर और टेस्ट पायलट थे, जो 1931 से 1945 के बीच फोक-वुल्फ के डिजाइन विभाग के प्रमुख थे। उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के अनेक उच्च स्तरीय जर्मन विमानों को डिजाइन किया। इनमें एफडब्ल्यू 190 फाइटर, टीए 152 फाइटर इंटरसेप्टर और एफडब्ल्यू 200 कॉण्डर एयरलाइनर शामिल है। एफडब्ल्यू 190 फाइटर टैंक के सबसे सफल डिजाइनों में से एक था। 1941 से 1945 के बीच ऐसे 20,000 से ज्यादा विमान बनाए गए। युद्ध के बाद ब्रिटिश 

सरकार ने टैंक से अनुबंध का प्रस्ताव नहीं किया। वे उन्हें तत्कालीन डिजाइन ग्रुप का हिस्सा बनाने की कल्पना तक नहीं कर पाए। उसके बाद टैंक ने अर्जेंटीना में काम किया, पर वहां की परियोजना के पास पैसा खत्म हो गया। डॉ. टैंक भारत में सबसे पहले आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर बनकर आए, जहाँ डॉ. एपीजे कलाम उनके छात्र थे। डॉ. टैंक अंतत: 1960 के दशक के उत्तरार्ध में मेसरश्मिट-बॉल्को-ब्लोह्म (एमबीबी) में कंसल्टेंट बनकर चले गए।  

जब डॉ. टैंक अगस्त, 1956 में बेंगलुरु आए, तो उन्हें एचएफ-24 की डिजाइन टीम का प्रमुख बनाया गया। उनके साथ उनके सहायक थे इंजीनियर मिट्टेलह्यूबर। उनका काम आसान नहीं था। हिन्दुस्तान एयरक्राफ्ट के पास सिर्फ तीन सीनियर डिजाइन इंजीनियर थे। उनके साथ काम करने वाले कुल 127 कर्मचारी थे। ज्यादातर मामलों में आधार ढाँचा था ही नहीं। यहाँ तक कि हिन्दुस्तान एयरक्राफ्ट के परिसर में फ्लाइट टेस्टिंग के लिए रनवे भी नहीं था। जिस वक्त सन 1961 में मारुत का पहला प्रोटोटाइप तैयार हुआ, डिजाइन टीम में 18 जर्मन डिजाइन इंजीनियर शामिल हो चुके थे। उसके अलावा 150 डिजाइन कर्मी, एक प्रोटोटाइप शॉप, 100 से ज्यादा कर्मचारियों वाला एक प्रोडक्शन डिपार्टमेंट भी था। डिजाइन का काम जून, 1957 में शुरू हुआ और एक पूरे आकार का लकड़ी का ग्लाइडर मॉडल 1959 के शुरुआती दिनों में तैयार हो गया। हिन्दुस्तान एयरक्राफ्ट में कोई विंड टनल नहीं थी, इसलिए डॉ. टैंक ने फ्लाइट ट्रायल अप्रैल, 1959 में शुरू किए। यह चरण 78 उड़ानों के साथ 24 मार्च, 1960 को पूरा हुआ। पहले एचएफ-24 प्रोटोटाइप की असेम्बली अप्रैल, 1960 में रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन की उपस्थिति में शुरू हुई। मारुत ने ऑपरेशनल स्टेटस 1 अप्रैल, 1967 को हासिल किया, डॉ. टैंक के बेंगलुरु आगमन के ग्यारह साल से भी कम समय के भीतर। शक्ति में कम होने के बावजूद यह विमान दरम्यानी तौर पर सफल था। 1971 के युद्ध में इसने अच्छा प्रदर्शन किया। कुल मिलाकर 147 विमान बनाए गए। इनमें से आखिरी विमान 1990 के आसपास सेवा से हटाया गया। एक एचएफ-24 मारुत आज भी जर्मनी में म्यूनिख के पास ओबरश्लाईशीम संग्रहालय में रखा है। 

एचएफ-24 का डिजाइन 8170 पौंड (3705 किलो) वजन के आफ्टरबर्निंग ऑर्फियस बीओआर 12 इंजन के आधार पर हुआ था। दुर्भाग्य से ब्रिटिश सरकार ने इस इंजन की जरूरत समाप्त कर दी और भारत सरकार ने इसके भावी विकास पर पैसा लगाने से मना कर दिया। सीधे-सीधे यह नासमझी की आर्थिक व्यवस्था थी। इस काम के लिए 1.3 करोड़ डॉलर की रकम किसी भी मानक से बड़ी राशि नहीं थी। इस अकेले दिशाहीन निर्णय ने मारुत कार्यक्रम को पंगु कर दिया। डिजाइन को विमान के शुरुआती और अंतरिम संस्करण के लिए 4850 पौंड (2200 किलो) के नॉन आफ्टरबर्निंग ऑर्फियस 703 को अपनाना पड़ा। इसके बाद इसके लिए उपयुक्त इंजन की लम्बी और असफल खोज शुरू हुई। पहले सोवियत संघ का मिग-19 एसएफ का तमांस्की आरडी-9एफ इंजन लगाकर देखा गया, पर वह अनुपयुक्त रहा। इसके बाद फर्डिनैंड ब्रैंडनर द्वारा मिस्र सरकार के लिए विकसित ई-300 टर्बोजेट देखा गया, पर 1967 के अरब-इजराइल युद्ध के बाद वह परियोजना खत्म हो गई। यह भी एक मौका गँवाया गया, क्योंकि ब्रैंडनर बेहतरीन डिजाइनर था जिसे जर्मनी में रहते हुए युद्ध का अच्छा अनुभव था। उसने पहले ऑपरेशनल टर्बोजेट इंजन जुमो 004 पर काम किया था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद उसने सोवियत संघ में काम किया। सन 1953 में ब्रैंडनर उस टीम के प्रमुख थे, जिसने दुनिया के सबसे शक्तिशाली टर्बोप्रॉप इंजन कुज्नेत्सोव एनके-12 को बनाया था। इस इंजन के आधार पर बने इंजन आज भी रूस में काम कर रहे हैं। सन 1972 से 1973 में ब्रैंडनर ने चीन में प्रोफेसर के रूप में काम किया और जर्मनी में कंसल्टेंट के रूप में वापस होने के पहले इंजन निर्माण पर काफी लेक्चर दिए। ब्रैंडनर के भीतर डॉ टैंक के काम को पूरा करने की क्षमता थी। 

सन 1964 में ब्रिस्टल सिडले ने भारत में बने ऑर्फियस 703 इंजन की क्षमता को मूल ऑर्फियस बीओआर 12 के बराबर बनाने का प्रस्ताव किया। भारत सरकार ने कीमत को लेकर फिर हाथ खींच लिए। इसके बाद अमेरिकी मदद की उम्मीदें पैदा हुईं, पर सोवियत संघ के साथ मिग-21 विमान के लाइसेंस के आधार पर निर्माण के समझौते ने मारुत का अंत कर दिया। मिग-21 के बाद विदेश से और खरीदारी हुई जैसे- जगुआर, मिग-23, मिग-25, मिग-27, मिग-29, मिराज-2000, सुखोई 30एमकेआई, एमएमआरसीए और एफजीएफए। कुल मिलाकर एक बेहतरीन शुरूआत का अपने उत्कर्ष तक पहुँचने के पहले ही अंत हो गया। 

नीलगिरि की कहानी

मारुत अभी डिजाइन के स्तर पर ही था कि भारतीय नौसेना ने भारतीय शिपयार्ड से अपनी जरूरतों को पूरा करने की सम्भावनाओं को तलाशना शुरू कर दिया। सारी सम्भावनाएं देखने के बाद 1965 में सरकार ने भारत में लिएंडर क्लास के युद्धपोत बनाने का फैसला किया। इसका डिजाइन बेहद सफल टाइप 12 फ्रिगेट पर आधारित था, जो भारतीय नौसेना की सेवा में थे। मुम्बई के मझगाँव डॉक लिमिटेड को यह पोत दो प्रतिष्ठित ब्रिटिश शिपयाडोंर्, वाइकर्स लिमिटेड और यैरो शिप बिल्डर्स लिमिटेड के सहयोग से बनाना था। यह एकदम आधुनिक डिजाइन था, क्योंकि उस क्लास का पहला पोत ब्रिटिश नेवी में सन 1969 में शमिल होने वाला था। वह राष्ट्रीय गौरव का क्षण था जब 23 अक्टूबर, 1968 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पहले पोत निर्माण का उद्घाटन किया। पहले पोत का नाम, उड़ीसा की देसी रियासत नीलगिरि पर रखा गया- आईएनएस नीलगिरि। सन 1947 में स्वतंत्रता के बाद भारतीय संघ में विलीन होने वाली पहली देसी रियासत थी नीलगिरि। इसके बाद इस वर्ग के पोतों के नाम भारतीय पर्वत श्रंृखलाओं पर रखे गए। 

हालांकि आईएनएस नीलगिरि का प्रारम्भिक निर्माण काफी तेजी से चला, पर तमाम रुकावटों के कारण इसे जून 1972 में ही कमीशन किया जा सका। कुछ विलम्ब की उम्मीद थी, क्योंकि बड़ी संख्या में कर्मचारियों को इस काम का प्रशिक्षण दिया गया। दूसरे किस्म के विलम्ब इसलिए थे क्योंकि हम विदेशी सामान का विकल्प देश में ही खोज रहे थे। बड़ी संख्या में भारतीय सहायक उत्पादक इससे जुड़े और वे अनजानी नई तकनीक से रू-ब-रू थे। नवीनतम तकनीक को हासिल करने के लोभ ने भी इसमें भूमिका अदा की। जब पहला पोत तैयार हो रहा था तभी अगली पीढ़ी के उपकरण हमें मिलने लगे। 

फ्रिगेट के अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के बाद सरकार ने दो महत्वपूर्ण व्यक्तियों को मझगाँव डॉक्स में नियुक्त किया। एचसी सरीन, आईसीएस को रक्षा उत्पादन सचिव के साथ-साथ यहाँ का चेयरमैन भी बनाया गया।  रियर एडमिरल एसएम नंदा को यहाँ का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया। टॉप मैनेजमेंट के साथ रक्षा मंत्रालय, नौसेना मुख्यालय और मझगाँव डॉक्स लिमिटेड की यह भागीदारी  फ्रिगेट परियोजना की सफलता के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई। 

शुरुआत से ही इस बात को लेकर संशय था कि भारत उतने उन्नत किस्म के जहाज बना भी पाएगा कि नहीं जितने उन्नत ब्रिटिश नेवी के पास हैं। कुछ संशय सही भी थे क्योंकि मझगाँव गोदी के सामने बड़ी चुनौतियाँ थीं। इस शिपयार्ड में परम्परागत रूप से जहाजों की मरम्मत और सहायक पोत बनाने का काम होता था। इन कामों के लिए इतने उच्च स्तर के कौशल की जरूरत नहीं थी जितना युद्धपोत बनाने के लिए चाहिए। इस गोदी में पिछला पोत एचएमएस कलकत्ता सन 1931 में बना था। युद्धपोत बनाने के लिए कई तरह की सामग्री और उपकरण भारत में उपलब्ध नहीं थे। इसके अलावा छोटी मात्रा में निर्माण होने के कारण भारतीय कम्पनियों के लिए स्वदेशीकरण किफायती भी नहीं था। इसलिए आयात प्रतिस्थापन एक लम्बी प्रक्रिया है और इसमें झटकों से बचा भी नहीं जा सकता। हालांकि शिपिंग मूल रूप में असेम्बली का काम है, पर इसमें गुणवत्ता की दरकार, विशेष सामग्री, प्रतिबंधित कार्यस्थल और अनेक प्रकार की अंतर्सम्बंधी गतिविधियों के कारण यह काम जटिल हो जाता है। 

निर्माण से जुड़ी टीम के विदेशी प्रशिक्षण की उपयोगिता मामूली थी। ब्रिटिश यार्ड में जहाज को बनते हुए देखना हालांकि उपयोगी अनुभव था, पर इस टीम के किसी भी व्यक्ति को निर्माणाधीन जहाज में काम की अनुमति नहीं थी। इससे इस ट्रेनिंग की उपयोगिता कम हो गई। हाथ से काम करने का जो अनुभव होता है उसकी बात ही कुछ और है। यूं भी केवल तीन सौ के आसपास लोग ट्रेनिंग के लिए ब्रिटेन गए, जबकि काम 1800 लोगों को करना था। सहयोग समझौते के अनुसार वाइकर्स और यैरो के 60 तक मैनेजर अलग-अलग समय में भारत आकर काम कर सकते थे। ये लोग सभी विषयों से जुड़े थे। यानी पोत निर्माण, डिजाइन, कार्मिक एवं प्रशासन विभाग, वैल्डिंग और मशीन शॉप वगैरह सभी से जुड़े। टॉप मैनेजरों की राय थी कि जहाज बनाने का काम सीखने के लिए दायित्व और अधिकार दोनों होने चाहिए। हर तरफ गलतफहमियों के बावजूद मैनेजमेंट ने तय किया कि ब्रिटिश विशेषज्ञों को थोड़े से अनुभवी सुपरवाइजरों तक सीमित रखा जाएगा। इसके कारण शिपयार्ड में किसी भी वक्त चार से ज्यादा ब्रिटिश विशेषज्ञ नहीं होते थे। इस प्रकार निर्माण टीम के सामने सीखने की भारी चुनौती थी और टीम ने इसे स्वीकार किया जिससे जो दूरगामी फायदा हुआ उसका हिसाब लगाना मुश्किल है। 

उधर, नौसैनिक मुख्यालय ने नीलगिरि के निर्माण में हो रही देरी का फायदा उठाते हुए इसके बाद बनने वाले जहाजों के सेंसरों और उपकरणों में सुधार कर लिया। एक पोत और दूसरे पोत में उपकरणों में बदलाव होना चाहिए या नहीं, इसे लेकर अलग-अलग धारणाएं थीं। मझगाँव डॉक्स की समझ थी कि बदलावों को टालकर जहाज कम समय और कम कीमत पर बनाए जा सकते हैं। जबकि नौसेना की मान्यता थी कि जहाजों को पुराने संेसरों, उपकरणों और हथियारों के साथ बनाने का क्या लाभ? पुरानी तकनीक का स्वदेशीकरण बेकार है। बदलाव का एक फायदा यह था कि डिजाइन टीम को यह समझने में आसानी हो रही थी कि बदलाव के साथ क्या-क्या बातें जुड़ीं हैं। एक बदलाव के कारण सहायक उपकरण और जहाज के पेंदे (हल) में अनेक बदलाव करने पड़ते थे। रियर एडमिरल बख्शी ने, जो बाद में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के अध्यक्ष और मैनेजिंग डायरेक्टर भी रहे थे, फ्रिगेट परियोजना की सफलता के कई कारण गिनाए: 

'भारतीय नौसेना का आत्मनिर्भर बनने का संकल्प। यह संकल्प कुछ व्यक्तियों के मन में रहने के बजाय कई पीढि़यों तक जारी रहा।

'नौसेना मुख्यालय की अतिरिक्त तकनीकी दायित्व वहन करने की पहल।

'नौसेना मुख्यालय के भीतर लिएंडर परियोजना निदेशालय बनने से पूर्ण प्रोडक्ट मैनेजमेंट सम्भव हुआ। डिजाइन, लीड यार्ड के साथ समन्वय, तकनीकी ड्रॉइंग तथा पोत निर्माण के सभी तकनीकी निर्णय नौसेना के भीतर ही हो पाए। 'नौसेना मुख्यालय के भीतर नेवल डिजाइन का महानिदेशालय बनाया गया। इसने धीरे-धीरे नौसेना के भीतर ही व्यापक डिजाइन और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कौशल विकसित करने की शुरुआत कर दी।  'नौसेना के अनेक असैनिक निर्माण अधिकारियों के छोड़कर चले जाने के बाद नौसेना ने सैनिक निर्माण अधिकारियों को भर्ती करना शुरू कर दिया। वे नौसैनिक आर्किटेक्चर, शिप डिजाइन और निर्माण में उच्च विशेषज्ञता प्राप्त काडर के रूप में तैयार हो गए।

'नौसेना ने अपने कुछ सर्वश्रेष्ठ अफसरों को शिपबिल्डिंग पर लगा दिया। आईएनएस नीलगिरि के बाद पाँच और फ्रिगेट बेहतर उपकरणों के साथ कमीशन किए गए। इसके बाद और उन्नत किस्म के गोदावरी और ब्रह्मपुत्र क्लास के छह जहाज और बनाए गए। इसके बाद 1997 और 2001 के बीच दिल्ली क्लास के तीन और डिस्ट्रॉयर कमीशन किए गए। स्टेल्थ डिजाइन के शिवालिक क्लास के तीन पोत 2010 से 2012 के बीच नौसेना की सेवा में आए। दिल्ली क्लास में और सुधार करके प्रोजेक्ट 15 बी वर्ग के चार डिस्ट्रॉयर जल्द सेवा में आ जाएंगे। फिलहाल कोच्चि शिपयार्ड में भारत का पहला विमान वाहक पोत बन रहा है। भारतीय नौसेना के पास देश में ही बने अनेक पोत और पनडुब्बियाँ सक्रिय हैं। 

सवाल है कि क्या वजह है कि दो अलग-अलग परियोजनाओं के अलग-अलग तरह के परिणाम मिले? मारुत को पहले काम शुरू करने का फायदा था। यह ज्यादा महत्वाकांक्षी परियोजना थी, जिसमें काफी सम्भावनाएं थीं। उसमें फायदे की गुंजाइश भी बहुत ज्यादा थी, क्योंकि वह एकदम जमीन से उठकर अत्याधुनिक विमान बनाने का कार्यक्रम था। डॉ. कुर्ट टैंक और उनकी टीम के लोग अनुभवी और कुशल थे और उन्होंने भरोसे को पूरा करके दिखाया। फर्डिनेंड ब्रैंडनर अपने दौर के श्रेष्ठ जेट इंजन डिजाइनर थे। एचएएल जेट फाइटर के निर्माण के अनुभव के साथ एक पूर्ण सक्रिय संस्थान था। दूसरी ओर नीलगिरि परियोजना एक उपलब्ध डिजाइन के 

लाइसेंस निर्माण की थी। डिजाइन और प्रोजेक्ट टीमें नौसिखिया थीं, जिन्होंने काम करते हुए सीखा। चुने गए शिपयार्ड के पास आधुनिक युद्ध पोत बनाने का कोई अनुभव नहीं था। निर्माणस्थल पर विदेशी विशेषज्ञों की संख्या काफी छोटी थी। दोनों परियोजनाएं महत्वाकांक्षी थीं। दोनों को ही कुछ सदमे लगे और विलम्ब भी हुआ। निश्चित रूप से दोनों को समझौते करने पड़े। पर नीलगिरि परियोजना सौभाग्यशाली रही। हर सदमे के बाद कोई न कोई सुधार हुआ, जबकि मारुत में हर सदमे ने एक कीमत वसूली। अंत में रवैया महत्वपूर्ण साबित हुआ। एक स्थिति के बाद वायु सेना ने हार मान ली। नौसेना डटी रही और उसने जीत हासिल की। आज नौसेना के सभी जहाज देश में ही बन रहे हैं। 

रियर एडमिरल विजय एस. चौधरीं(सेनि)

 

(लेखक सेंटर फॉर ज्वाइंट वारफेयर स्टडीज (सेंजोस) के अतिरिक्त निदेशक हैं।) 

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