Wednesday 13 November 2019, 01:09 PM
सरकार के पास नया केरल बनाने का मौका
By टी.पी.श्रीनिवासन | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 8/25/2018 12:41:08 PM
सरकार के पास नया केरल बनाने का मौका

केरल को 'ईश्वर का घर' की उपमा यहां की सुंदरता और शांति के लिए दी गई थी। लेकिन यह मानकर कि राज्य का कल्याण भगवान के हाथों में है, यह अर्थ निकालकर लोगों को अपने भविष्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी से वंचित कर दिया गया। 'केवल ईश्वर जानता है' या 'भगवान अपने देश को बचाते हैं'.. ऐसी टिप्पणियां संकट के समय आम हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि अगस्त की इस विनाशकारी बाढ़ को कुछ लोग देवताओं का क्रोध बता रहे हैं। 

मौजूदा समय में दक्षिण भारतीय राज्य केरल का हिस्सा त्रावणकोर के एक शासक ने जब तिरुवनंतपुरम के कुलदेवता पद्मनाभ को अपने राज्य की बागडोर सौंपी थी, तब इसके पीछे उनकी यह सोच थी कि उन्होंने अपेक्षाकृत बड़ी जिम्मेदारी मानी है, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान के प्रति उत्तरदायी थे। 

बहुत से लोग मानते हैं कि मंदिरों में कुछ अनुष्ठानों और प्रथाओं को लेकर हालिया बहस से देवता नाराज हो गए हैं, लेकिन वर्तमान संकट का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह निकलता है कि अपनी देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद की होती है। 

मृतकों और बेघर लोगों के आंकड़े व बुनियादी ढांचे का नुकसान अंतर्राष्ट्रीय मानकों के आधार पर गंभीर नहीं हैं, लेकिन केरल जैसे छोटे राज्य के लिए 350 से ज्यादा मौतें, 8,00,000 लोगों का विस्थापन, 4000 राहत शिविर और 10,000 किलोमीटर सड़कों का क्षतिग्रस्त और इसके वैश्विक तौर पर पुरस्कृत हवाईअड्डे का क्षतिग्रस्त होना बहुत बड़ी बात है। 

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और संयुक्त राष्ट्र को यह महसूस करने में पूरा एक सप्ताह लगा कि त्रासदी काफी बड़ी है। राज्य की जिंदगियां बचाने के लिए अपनी पूरी क्षमता लगा देने के बाद अब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर से सहायता की बाढ़-सी आ गई है। जबकि भारत सरकार को भी त्रासदी की गंभीरता का अहसास करने में समय लगा। 

यहां राज्य सरकार के स्वैच्छिक संगठनों को श्रेय जाता है कि लोगों की व्यापक भागीदारी के साथ बचाव और राहत प्रयासों को शुरू करने में कोई समय नहीं गंवाया। आम तौर पर राजनीतिक, धार्मिक और जातीय संघर्ष में फंसे राज्य, जहां हिसा असामान्य नहीं है, केरल ने इस मौके पर मतभेदों को छोड़कर और दोषारोपण के खेल में शामिल हुए बिना समस्या पर ध्यान केंद्रित किया।

इस त्रासदी के चौंका देने वाले प्रभाव ने समुदायों को बदल दिया है। सोशल मीडिया के प्रति केरल की लत, जिसे बुराई माना जाता था, उसने बचाव अभियान में एक प्रमुख भूमिका निभाई। बेशक कुछ विकृत मानसिकता वालों ने भी निराधार सूचना फैलाने या राहत प्रयासों में अडं़गा डालने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया। 

जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र की आपदा प्रबंधन इकाई के प्रमुख मुरली थुमरुकुडी ने कई बार कहा है "दुर्घटनाएं टाली नहीं जा सकती लेकिन आपदाएं टाली जा सकती हैं।" थुमरुकुडी को केरल के नास्त्रेदमस के रूप में जाना जाने लगा है, क्योंकि उन्होंने उत्तराखंड त्रासदी के दौराज जो कुछ हुआ, उसके आधार पर ऐसी ही त्रासदी की भविष्यवाणी की थी। 

यह आकलन करने में काफी समय लगेगा कि क्या किया जा सकता था और भविष्य में क्या किया जाना चाहिए। केरल में इसी तरह की एकमात्र प्राकृतिक आपदा 1924 की बाढ़ है। लेकिन उस अनुभव से सीखे गए सबक को राज्य ने एक शताब्दी में भुला दिया था।

लेकिन क्या हो सकता था, वह यह है कि कुछ जगहों पर दर्ज गंभीर जलस्तर का पता लगाने और उन स्तरों के ऊपर घरों और अन्य इमारतों के निर्माण को रोका जा सकता था, या फिर उन्हें यहां से हटाया जा सकता था। जाहिर है ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि इसके पीछे यह धारणा थी कि इतिहास खुद को दोहराएगा नहीं। 

केरल के पश्चिमी तट पर स्थित पर्वतश्रृंखला जिसे वेस्टर्न घाट भी कहा जाता है। इस पर परिस्थितिविज्ञानी माधव गाडगिल ने वर्ष 2011 में एक रिपोर्ट दी थी, जिसमें इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी को संरक्षित करने के लिए कई उपाय सुझाए गए थे। माधव खुद सहमत हैं कि बारिश की तीव्रता इसका कारण है और वह कहते हैं कि 'मुझे पूरा विश्वास है कि राज्य में पिछले कई सालों के विकास ने इस तरह की घटनाओं से निपटने की क्षमता को काफी हद तक प्रभावित किया है और आज हम जो पीड़ा झेल रहे हैं, यह उसका परिणाम है। अगर उचित कदम उठाए जाते तो आपदा इतनी भयावह नहीं होती।

यह स्वीकार्य तर्क है कि मानव गतिविधि जलवायु परिवर्तन का कारण बनती है, जो आपदाओं की ओर ले जाती है। लेकिन यह बात केवल कुछ हद तक सच हो सकती है। वरना हम मानव निर्मित पारिस्थितिक परिवर्तनों के बिना डायनासोर के विलुप्त होने जैसी घटनाओं को समझने में सक्षम नहीं हो सकते हैं। 

इसके अलावा त्रासदी का और अधिक प्रासंगिक कारण बारिश की तीव्रता और बांधों की अपर्याप्त सुरक्षा और प्रबंधन हो सकता है। सावधानियों के बावजूद प्राकृतिक आपदाएं हो सकती हैं, लेकिन आपदा के दौरान लोगों को संगठित करने और जिदगियां बचाने और जीवित रहने का साधन प्रदान करने के लिए एक आपदा चेतावनी प्रणाली और मशीनरी जरूरी है।यहां यह बात भी बतानी जरूरी है कि हमें जल प्रलय लाने की क्षमता वाले मुल्लापेरिया बांध से अपना ध्यान नहीं हटाना चाहिए। जबकि तमिलनाडु और केरल के बीच विवादों के कारण इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया गया। 

केरल में मौत की संख्या स्वयंसेवकों की सही समय पर पहुंचाई गई मदद के कारण तेजी से नहीं बढ़ी। भले ही विदेश मंत्रालय को अहसास हो गया कि यह त्रासदी अंतर्राष्ट्रीय सहायता पाने लायक है, यहां तक कि आपदा को तीसरी श्रेणी में शामिल किए जाने के बावजूद सरकार आत्मनिर्भरता की अपनी नीति में फंसी रही। सरकार की नीति इस सोच पर आधारित है कि भारत अब सहायता लेने के बजाय पर्याप्त शक्तिशाली है। लेकिन बड़े पैमाने पर पुनर्वास और पुनर्निर्माण कार्य हमारी क्षमता से अधिक हैं और यह एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करता है। 

देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में सबसे आगे रहे केरल के समक्ष बाढ़ के बाद संक्रमण से होने वाली बीमारियों का प्रकोप रोकना एक और चुनौती है। सरकार संयुक्त राष्ट्र और रेड क्रॉस के साथ काम करने के लिए तैयार है, ताकि परियोजनाओं को वित्त पोषित किया जा सके। इसलिए पिछली मूर्खतापूर्ण हरकतों को छोड़ सहायता के लिए हाथ आए अवसर का उपयोग आधुनिक केरल बनाने के लिए किया जाना चाहिए। 

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केरल,अनुष्ठानों,सुरक्षा,विनाशकारी,तिरुवनंतपुरम,कुलदेवता,दोषारोपण,शताब्दी

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