Tuesday 19 November 2019, 11:58 PM
सफलता का कारण बेहतरीन समन्वय
By सुशील शर्मा | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 12/16/2017 4:33:06 PM
सफलता का कारण बेहतरीन समन्वय
सीआरपीएफ महानिदेशक राजीव राय भटनागर

देश की आंतरिक सुरक्षा और हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने में स्थानीय प्रशासन की मदद करने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले और सेना के बाद दूसरा सबसे बड़ा सुरक्षा बल केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अत्यंत विकट हालात में कार्य करने वाले सीआरपीएफ और उसके अधिकारियों और जवानों की क्या परेशानियां है, जवानों के लिए हल्के और घातक हथियारों के साथ ही बेहतरीन बुलेटप्रूफ वस्त्रों, बुलेटप्रूफ वाहनों, जवानों के लिए कल्याणकारी योजनाओं और आधुनिकीकरण से जुड़े तमाम सवालों पर 'डिफेंस मॉनिटर' के संपादक सुशील शर्मा ने सीआरपीएफ के महानिदेशक राजीव राय भटनागर से विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

सीआरपीएफ को 600 माइनप्रूफ वाहनों की जरूरत, खरीद प्रक्रिया जारी

बड़ी संख्या में यूएवी खरीद की योजना

नक्सलियों की गतिविधियों का दायरा 60 फीसदी घटा

आतंकियों के आर्थिक  स्रोत पर चोट से भी मिली मदद

 

नक्सली हिंसा को खत्म करने के लिए सीआरपीएफ की ओर से कौन से विशेष कदम उठाए जा रहे हैं जो इस लड़ाई में नक्सलियों पर भारी पड़ेंगे?

सबसे महत्वपूर्ण कदम यह है कि हमारी फोर्स और राज्यों की पुलिस के बीच तालमेल काफी बेहतर हुआ है। हम उनके टास्क फोर्स जैसे, झारखंड में जगुआर फोर्स, महाराष्ट्र में फोर्स वन, छत्तीसगढ़ में उनकी विशेष टास्क फोर्स के साथ मिल कर अभियान चलाते हैं जिसके काफी सकारात्मक परिणाम निकल रहे हैं। हम साथ-साथ प्रशिक्षण लेते हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई के लिए जुट जाते हैं। बेहतर समन्वय और एकजुट होकर समन्वित खुफिया सूचनाओं के आधार की जा रही कार्रवाइयों से आतंकवादियों के पांव उखड़ने लगे हैं।

सुरक्षा बलों और पुलिस के बीच ऐसा अभूतपूर्व समन्वय कैसे संभव हुआ?

हमने प्रशासन, सेना और पुलिस के साथ सर्वोच्च स्तर से निचले स्तर तक सामंजस्य स्थापित किया। हर स्तर पर स्थापित सामंजस्य के कारण प्रभावी एकजुट अभियान काफी सफल होने लगे। साथ ही सटीक खुफिया सूचनाएं मिलने से हमारे अभियान सफल होने लगे।

नक्सल प्रभावित इलाकों में मानव रहित विमानों की भूमिका कितनी प्रभावी होती है और क्या आप अपने यूएवी फ्लीट को बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं?

हम बेहतर हवाई सर्वेक्षण और नक्सली गतिविधियों पर नजर रखने के लिए यूएवी का इस्तेमाल कर रहे हैं। फिलहाल हमारे पास माइक्रो यूएवी हैं और हम मिनी यूएवी भी खरीदने जा रहे हैं। हम ऐसे यूएवी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने जा रहे हैं। माइक्रो यूएवी देश में भी उपलब्ध हैं लेकिन मिनी यूएवी हमें विदेशों से खरीदने होंगे। साथ ही, हवाई निगरानी और फील्ड स्ट्रेटिक रेडार के अलावा हम डे एंड नाइट व इनफ्रारेड कैमरों के साथ जमीनी निगरानी केन्द्र स्थापित कर रहे हैं। ऐसी ग्राउंड सर्विलांस टेक्नोलॉजी का पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया। ऐसे स्टेशनों के लिए हम उपयुक्त स्थानों का चयन कर रहे हैं जहां से हम 10-15 कि.मी. के दायरे में हर गतिविधि पर कड़ी नजर रख सकें।

छत्तीसगढ़ में दक्षिण बस्तर में सीआरपीएफ पर काफी घातक हमले हुए हैं। नक्सल प्रभावित इस क्षेत्र में घने जंगलों के कारण यूएवी से कैसे निगरानी हो सकती है?

निश्चय ही मानसून के दौरान और उसके कुछ बाद जंगलों की सघनता के कारण यूएवी से चित्र लेने में परेशानी होती है लेकिन बाकी समय ऐसी समस्या नहीं होती। वैसे भी हम जल्दी ही फोलिज पेनिट्रेशन यानी पत्तियों के छुरमुट को भेद सकने वाले राडार खरीदने के विकल्प पर भी विचार कर रहे हैं।

क्या इस काम के लिए उपग्रहों की भी मदद ली जा सकती है?

हम ऐसी राडार प्रणालियों को हेलिकॉप्टरों पर लगा सकते हैं। साथ ही इन्हें जमीन पर स्थित केन्द्रों पर भी लगाया जा सकता है। आमतौर पर ऐसे राडारों के लिए हम हेलिकॉप्टरों और यूएवी का इस्तेमाल करेंगे।

क्या सीआरपीएफ के लिए हेलिकॉप्टर और यूएवी का समर्पित बेड़ा रखने की भी कोई योजना है?

नहीं, हमें भारतीय वायुसेना और बीएसएफ से हेलिकॉप्टर उपलब्ध होते हैं इसके अलावा राज्य सरकारें सुरक्षा संबंधी खर्च के तहत किराये पर भी हेलिकॉप्टर उपलब्ध कराती हैं। हम नये यूएवी खरीद रहे हैं। फिलहाल 25 माइक्रो यूएवी का टेंडर जारी किया गया है। हमें मिनी यूएवी भी चाहिए। इसके लिए हम देश-विदेश के बाजारों से जानकारी ले रहे हैं। हमारी कोशिश है कि हम बेहतरीन यूएवी खरीदें। कुछ यूएवी परीक्षण के लिए हमें उपलब्ध कराए गए हैं।

खबरों के मुताबिक नक्सल विरोधी आपके अभियान के लिए उपलब्ध माइन प्रूफ वाहन उपलब्ध कराए गए हैं वे ज्यादा कारगर साबित नहीं हुए। इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

ऐसा नहीं है, हमारे पास माइनप्रूफ वेहिकल्स (एमपीवी) मौजूद हैं और हम और अधिक ऐसे वाहन खरीद रहे हैं। हम बारुदी सुरंगरोधी वाहनों का अपने अभियानों में अधिक से अधिक प्रयोग करेंगे। हम कुछ छोटे ऑल टैरेन माइनप्रूफ वाहन भी खरीदेंगे। विदेशों में ऐसे वाहन उपलब्ध हैं लेकिन हम चाहते हैं कि हम स्वदेशी वाहन खरीदें। इस दिशा में कुछ कंपनियां प्रयास कर रही हैं।

नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन में कोबरा बटालियनें कितनी प्रभावी साबित हुई हैं और क्या इनकी संख्या बढ़ाने पर विचार हो रहा है?

अभी हमारी 10 कोबरा बटालियनें हैं और इतनी काफी हैं। ये महाराष्ट्र की फोर्सवन, झारखंड की जगुआर और छत्तीसगढ़ की स्पेशल टास्कफोर्स के साथ मिलकर नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाते हैं। यह सोचना गलत है कि नक्सली हर जगह एक जैसी रणनीति अपनाते हैं। अलग-अलग इलाके में उनकी अलग-अलग रणनीति होती है और हम भी उसी के अनुरूप अपनी जवाबी रणनीति तैयार करते हैं।

इन अभियानों में आपकी सफलता का दर कितना होता है?

गत मार्च-अप्रैल में छत्तीसगढ़ के सुकमा इलाके में दो बार नुकसान हुआ, लेकिन हमने इसके बाद सफलता के साथ अभियान चलाते हुए नक्सलियों के गढ़ पर हमले किए। सौभाग्य से अप्रैल से अबतक सीआरपीएफ में कोई कैज्युअल्टी नहंी हुई और घायलों की संख्या भी काफी कम रही है। इस क्षेत्र में इंटैलीजेंस एक समस्या रही है, लेकिन बाकी इलाकों में ऐसी समस्या नहीं है। उम्मीद है कि आने वाले समय में हमारे अभियान और भी सफल होंगे।  दक्षिणी बस्तर में नक्सली समस्या सबसे ज्यादा है और इनसे निपटने के लिए नई सड़कें बनाने का काम हो रहा है लेकिन इस काम के लिए ठेकेदार कम मिलते हैं। नक्सली अक्सर जमीन के नीचे आईईडी बिस्फोटक लगा देते हैं। इसके अलावा वहां सुरक्षा व जरूरी सामग्री जैसे कुछ मुद्दे अभी हैं। उम्मीद है कि वहां सड़कें जल्दी बनेगी ताकि लोगों के आवागमन से सुरक्षा का माहौल तैयार होगा।  जैसे कि मैंने कहा हमारे ऑपरेशन काफी सफल रहे हैं और पिछले तीन-चार वर्षों में नक्सलियों की गतिविधि के इलाकों को 60 % तक कम कर दिया है। अन्य राज्यों में स्थिति में काफी सुधार हुआ है और हम पूरी तरह दक्षिणी बस्तर पर ध्यान कंेंद्रित कर रहे हैं।

नक्सली गढ़ को तोड़ने के लिए आपकी क्या रणनीति है?

दक्षिणी बस्तर की सीमा ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड से लगती है। इसलिए हम इन राज्यों के साथ मिलकर अभियान चलाते हैं जिन क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन की पहुंच नहीं है वहां हम पहुंच रहे हैं।

सीआरपीएफ की महिला बटालियनें भी क्या ऐसे अभियानों में शामिल होती हैं?

हमारी महिला बटालियने पश्चिम बंगाल के नक्सल इलाकों में तैनात हैं लेकिन हम एक और बटालियन बस्तर इलाके से ही तैयार कर रहे हैं जिसमें एक चौथाई महिलाएं होंगी जिन्हें उसी क्षेत्र में तैनात किया जाएगा।

जम्मू-कश्मीर में सीआरपीएफ के अभियान कैसे चल रहे हैं?

जम्मू-कश्मीर में हमारी 40 बटालियन हैं और हम वहां अच्छा काम कर रहे हैं। हमारे अभियान राज्य की पुलिस के साथ पूरे तालमेल के साथ चलाए जा रहे हैं। इस वर्ष 170 आतंकवादी मारे जा चुके हैं जिनमें उनके कई बड़े कमांडर शामिल हैं। हमने गत जून में बांदीपोरा जिले में सुम्बल कैंप पर फिदाई हमलों को नाकाम किया। चार आत्मघाती आतंकी मारे गए। बीएसएफ और पुलिस लाइन्स के कैंपों पर भी आतंकियों ने हमले किए जिन्हें नाकाम किया गया जिनमें हमारे चार लोग शहीद हुए।

खबरों के मुताबिक इन दिनों जम्मू-कश्मीर पुलिस आतंकियों के खिलाफ काफी सक्रिय हो गई है, पहले ऐसा नहीं था, लेकिन अब पुलिस और सुरक्षा बलों के बीच तालमेल बेहतर होने के क्या कारण हैं?

जम्मू-कश्मीर में सेना राज्य पुलिस और सीआरपीएफ के बीच बेहतरीन तालमेल है। केंद्र और राज्य स्तर पर बेहतरीन अधिकारी और नेतृत्व से यह तालमेल और मजबूत हुआ। अब हम तालमेल के साथ और अच्छे प्रशिक्षण के साथ अभियान चलाते हैं और कम घातक हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। इससे दोनों ओर से घायलों की संख्या में कमी आई है जिससे माहौल बेहतर हुआ है। हम सही रणनीति अपना  रहे हैं।

घाटी में पत्थरबाजी की घटनाओं में कमी आने के कौन से प्रमुख कारण हैं?

हमने लोगों की मानसिकता को समझा है, हम समझ गए हैं कि पत्थरबाज कैसे एकत्रित होते हैं और कैसे काम करते हैं। हमने रणनीति बदली है और घटना से पहले ही रोकथाम के कदम उठाते हुए उन्हें एकत्रित होने से रोकते हैं। हम उन तिथियों पर खास ध्यान रखते हैं जब बंद का आह्वान किया जाता है। हम इस बात पर नजर रखते हैं कि पत्थरबाज किधर से आएंगे, कहां एकत्रित होंगे और क्या करेंगे। इसलिए हम कठोर नाकाबंदी करते हैं और हवाई सर्वेक्षण भी करते हैं। जहां आतंकवादियों के खिलाफ अभियान चलाया जाता हो वहां पत्थरबाज न पहुंच सके इसका खास ध्यान रखा जाता है। साथ ही इनसे निपटने में हम काफी संयम भी बरते हैं जिससे अच्छे नतीजे भी निकलते हैं। जवानों की सुरक्षा के लिए हमने सुरक्षा कवच उपलब्ध कराए हैं और उन्हें बेहतर प्रशिक्षण भी दिया है।

आतंकियों के वित्तीय श्रोत पर आघात करना कितना मददगार साबित हुआ?

एनआईए ने उनके वित्तीय आधार पर चोट कर बहुत अच्छा काम किया है। इससे काफी मदद मिली है। इसके अलावा हमने पत्थरबाजों के सोशल नेटवर्क और अन्य तरीकों को समझा और उसे तोड़ने के अभियान चलाए।

जवानों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?

हम उनके लिए सुरक्षा उपकरण के अलावा अच्छे बैरक,मेष , बिजली , परिवहन, मनोरंजन और छुटटी आदि की व्यवस्था में सुधार किया है। सातवें वित्त आयोग में जवानों का जोखिम भत्ता भी बढ़ाया गया है। जवानों के निजी सुरक्षा साधनों में कुछ कमियां थी जिन्हें दूर किया जा रहा है। हम उन्हें पूरी शरीर की सुरक्षा के लिए बॉडी शूट उपलब्ध करा रहे हैं। अभियानों के लिए सुरक्षित वाहन और कवच उपलब्ध करा रहे हैं। भारी बुलेटप्रूफ जैकेटों के स्थान पर हल्के लेकिन मजबूत बुलेटप्रूफ जैकेट उपलब्ध कराए जा रहे हैं। बुलेटप्रूफ वाहनों की संख्या बढ़ाई जा रही है। कुछ वाहनों को हमने देशी तरीके से भी बुलेटप्रूफ बनाया है। ऐसे वाहनों पर स्टील की प्लेट के साथ कांक्रिट का इस्तेमाल किया जाता है जिन्हें जम्मू के फैब्रिकेटर बनाते हैं। नये वाहनों की खरीद में समय ज्यादा लगता है लिहाजा उनके खरीद के साथ-साथ हम देशी तरीके से भी बुलेटप्रूफ वाहन बना रहे  हैं। हमने लगभग 30 से ज्यादा लाइट बुलेटप्रूफ वाहनों के लिए ऑर्डर दिया है। यह 2011 के बाद की पहली खरीद होगी। मीडियम बुलेटप्रूफ वाहनों की खरीद प्रक्रिया भी जारी है। हमें दोनों वर्ग के लगभग 600 वाहनों की जरूरत है।

सीआरपीएफ जवानों और उनके परिवारों के लिए क्या कल्याणकारी योजनाएं हैं?

हमारे शहीदों के लिए जैसा कि माननीय गृहमंत्री ने कहा, हम उनके परिजनों को समुचित आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं। हमारा अपना रिस्क फंड है और हम अपनी तरफ से हर शहीद को लगभग 22लाख रुपये देते हैंे। उनके परिवार के लोगों की देखभाल की भी व्यापक व्यवस्था है। शहीदों के अलावा हम उन जवानों के परिवारों का भी पूरा ध्यान रखते हैं जो सेवा करते समय किसी दुर्घटना या अन्य हादसे में मारे जाते हैं। ऐसे जवानों के परिजनोंे को उनकी सेवानिवृत्ति तक का पूरा वेतन दिया जाता है। विधवाओं और उनके बच्चों को ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें विशेष पहचान पत्र दिया जाता है। उनके बच्चों को छात्रवृत्रि और शिक्षा के लिए सहायता आदि देते हैं।

क्या घाटी के लोगों की मानसिकता में कुछ बदलाव आया है?

निश्चय ही वहां के आम लोग यह बात समझते हैं कि तरक्की के जो अवसर भारत में मिलते हैं वह कहीं और नहीं मिल सकते। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा। हमारा देश एक प्रगतिशील देश है और वे समझते हैं कि भारत के साथ बने रहने में ही फायदा है, हम जम्मू-कश्मीर में कई सामाजिक कार्यक्रम जैसे 14 और 17 साल से कम उम्र के बच्चों के फुटबॉल मैच आयोजित करते हैं जो काफी लोकप्रिय हैं। हम वहां खेल का प्रशिक्षण देते हैं और महिलाओं के कंप्यूटर सिखाते हैं और ग्रामीणों के साथ कई कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। हम ग्रामीणों के जरूरत के मुताबिक बस स्टॉप, छोटे पुल, पानी आदि की व्यवस्था भी करते हैं। वहां के क्लबों को खेल और मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराते हैं, स्कूल बैग देते हैं और चिकित्सा शिविर भी लगाते हैं जहां बड़ी संख्या में लोग इलाज के लिए आते हैं। हम अपने ऐसे सभी सामाजिक कार्यक्रम नागरिक प्रशासन के साथ मिलकर आयोजित करते हैं।

 

सीआरपीएफ की अगुवाई करना मेरे लिए गर्व की बात है। हमारे जवान कठिन हालात के बावजूद पूरे उत्साह और बहादुरी के साथ काम कर रहे हैं। हमारे अधिकारी अपने जवानों की आगे बढ़कर अगुवाई करते हैं। सीआरपीएफ के कार्य को मान्यता देते हुए सरकार ने इस वर्ष 15 अगस्त को, दो कीर्त्िाचक्र, दो शौर्यचक्र और 53 वीरतापदक प्रदान किए। निश्चय ही हमारे अधिकारी और जवान प्रशंसा के पात्र हैं। 

 

Tags:

सफलता,बेहतरीन,समन्वय,सीआरपीएफ,जगुआर फोर्स,सामंजस्य,हेलिकॉप्टरों,

DEFENCE MONITOR

भारत डिफेंस कवच की नई हिन्दी पत्रिका ‘डिफेंस मॉनिटर’ का ताजा अंक ऊपर दर्शाया गया है। इसके पहले दस पन्ने आप मुफ्त देख सकते हैं। पूरी पत्रिका पढ़ने के लिए कुछ राशि का भुगतान करना होता है। पुराने अंक आप पूरी तरह फ्री पढ़ सकते हैं। पत्रिका के अंकों पर क्लिक करें और देखें। -संपादक

Contact Us: 011-66051627

E-mail: bdkavach@gmail.com

SIGN UP FOR OUR NEWSLETTER
NEWS & SPECIAL INSIDE !
Copyright 2018 Bharat Defence Kavach. All Rights Resevered.
Designed by : 4C Plus