Wednesday 20 November 2019, 08:12 PM
1965 की जंग पाक के 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' की उड़ा दी धज्जियां
By मे. ज. पीके चक्रवर्ती (सेनि),ब्रि. गुरमीत कँवल (सेनि) | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 11/24/2017 1:18:02 PM
1965 की जंग पाक के 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' की उड़ा दी धज्जियां
1965 में हाजी पीर दर्रे पर तिरंगा फहराते भारतीय जवान

जम्मू-कश्मीर राज्य का भारत में विलय, 26 अक्तूबर, 1947 को तब हुआ जब पाकिस्तानी हमलावर श्रीनगर पहुंचने वाले थे। पाकिस्तान ने इस विलय को स्वीकार नहीं किया और तब से उसकी कोशिश है कि हर कीमत पर जम्मू-कश्मीर को हड़पा जाए। पाकिस्तान की विदेश नीति में जम्मू-कश्मीर 'कोर इश्यू' है। इस उद्देश्य के लिए  पाकिस्तान की हर सरकार भारत के साथ लड़ाई लड़ती रही है। पाकिस्तान सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन (सेंटो) और साउथ ईस्ट एशिया ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन (सीटो) का सदस्य बनकर अमेरिका के खेमे में भी शामिल हो गया। साथ ही, वह संयुक्त राष्ट्र में लगातार कोशिश करता रहा। सन् 1956 से 1962 के बीच अमेरिका ने उसे भारी फौजी सहायता दी। इससे उसकी आक्रामक क्षमता बढ़ी और दोनों देशों की सैन्य क्षमता का अंतर कम हुआ। 

पाकिस्तान को इस बात से काफी खुशी मिली कि सन् 1962 के युद्ध में, भारत को चीन के मुकाबले हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद पाकिस्तान ने चीन से दोस्ती बढ़ाई और उस मौके का इंतजार करना शुरू किया जब फौजी ताकत के जोर पर उसके मंसूबे पूरे हों। इसके अलावा पाकिस्तान ने अमृतसर-लाहौर सेक्टर में अंतरराष्ट्रीय सीमा के समानांतर इच्छोगिल नहर बनाई ताकि भारतीय सेना कभी आगे बढ़ने की कोशिश करे तो नहर पार करने में उसके सामने दिक्कतें आएं। उसे इस बात की खुशी थी कि उसके उत्तर में, चीन के रूप में ऐसा दोस्त है जो भारत के मुकाबले ताकतवर है और उसका शत्रु भी। दोनों के बीच 2 मार्च, 1963 को एक ऐतिहासिक समझौता हुआ जिसके तहत पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर की शाक्सगम घाटी चीन को सौंप दी। इससे दोनों देशों का गठबंधन और मजबूत हो गया। इस दौरान पाकिस्तान ने सोचा कि इससे पहले कि भारतीय सेना 1962 की लड़ाई से सबक सीखकर अपनी क्षमता सुधारे, कश्मीर पर कब्जा कर लेना चाहिए। 

पराजित पाक सेना के युद्ध बंदी .
अगस्त-सितम्बर, 1965 में हुई लड़ाई के पहले, फरवरी में कच्छ में दोनों देशों के बीच एक संघर्ष हुआ। यहांं के ज़मीनी हालात पाकिस्तान की मदद करते थे, इसलिए उसने हमला तो कर दिया पर भारतीय सेना ने उसे फौरन ही रोक दिया। इसके साथ ही, जवाब में पश्चिमी सीमा पर तैनात भारतीय सेना ने 16 और 17 मई को करगिल में तीन चौकियों पर कब्जा कर लिया। इसके बाद 1 जुलाई को एक युद्धविराम समझौता हुआ। उधर, पाकिस्तानियों ने भारतीय सेना की आक्रामक क्षमता का गलत आकलन कर लिया और कश्मीर पर कब्जा करने के अपने सपने को पूरा करने की योजना बनानी शुरू कर दी। यहां यह बताना भी जरूरी है कि कच्छ का मामला निपटा लिया गया और करगिल में जिन तीन चौकियों पर भारत ने कब्जा किया था, उन्हें छोड़ दिया। 

ऑपरेशन जिब्राल्टर की योजना

फील्ड मार्शल अयूब खां ने 1965 की गर्मियों में, एक सीमित युद्ध के लिए गोपनीय रूप से अनुमति दे दी। सेना अध्यक्ष जनरल मूसा और कुछ अन्य सेनाधिकारी इस युद्ध के पक्ष में नहीं थे, फिर भी यह अनुमति दे दी गई। बाद में 12 वीं इनफैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग जनरल अख्तर मलिक ने  इस बात की पुष्टि की कि ऑपरेशन जिब्राल्टर की योजना बनाने और लागू करने की जिम्मेदारी उन्हें दी गई थी। जुल्फिकार अली भुट्टो और अनेक वरिष्ठ अधिकारियों की राय थी कि भारत बड़े युद्ध के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में पाकिस्तान को या तो इसी वक्त र्कारवाई करनी चाहिए या कुछ ऐसा करना चाहिए जिसके जवाब में भारत हमला करे। इसी अवधारणा पर जनरल मलिक अपनी योजना बनाने लगे।

ऑपरेशन जिब्राल्टर की योजना इस प्रकार बनाई गई थी कि जम्मू-कश्मीर में बड़े स्तर पर अशांति पैदा हो। योजना थी कि तकरीबन 8,000 पाकिस्तानी सैनिक और रजाकार (हथियारबंद फसादी) जम्मू-कश्मीर में छापामार के रूप में भेजे जाएं। पहले चरण में उनकी योजना यह थी कि वे कुछ खास स्थानों पर हमले करें ताकि दहशत पैदा की जाए। इसकी वजह से राज्य में अराजकता पैदा होगी। दूसरे चरण में नागरिकों की बगावत और घुसपैठियों की कार्रवाई होनी थी। 

पाकिस्तान की सोच थी कि इस परिस्थिति से निपटने के लिए भारत बड़े स्तर पर राजनीतिक और फौजी कार्रवाई करेगा जिससे दुनिया के सामने संदेश जाएगा कि कश्मीर में समस्या है। सशस्त्र लड़ाके भारतीय सेना को उसी तरह छापामार युद्ध में उलझा लेंगे, जिस तरह वियतनाम में अमेरिकी सेना को उलझाया था। जनरल मलिक खुद मानते थे कि अकेले ऑपरेशन जिब्राल्टर से काम पूरा नहीं हो पाएगा। 
 
इसीलिए, ऑपरेशन जिब्राल्टर के साथ ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम को जोड़ा गया जिसके तहत युद्ध विराम रेखा पार करके अखनूर पर कब्जा किया जाता जिससे भारत से श्रीनगर जाने वाली सप्लाई लाइन कट जाती। इस योजना को फील्ड मार्शल अयूब खां ने, मई 1965 में सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लिया। वे इस बात से मुतमइन थे कि कश्मीर समस्या का समाधान करने के लिए फौजी कार्रवाई जरूरी है। ऑपरेशन की योजना अगस्त के शुरू में बनाई गई और फील्ड मार्शल ने जिब्राल्टर फोर्स के अफसरों को, उनकी जिम्मेदारियों और उनसे अपेक्षाओं को लेकर संबोधित किया। 

पाकिस्तानी सेना की तैयारियां

मई में अयूब खां की स्वीकृति मिलने के बाद, जनरल मलिक ने सीनियर कमांडरों को चिट्ठी लिखी कि वे और ज्यादा आक्रामक रुख अपनाएं तथा कश्मीर-समस्या के शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद छोड़ दें। हिंसक तरीकों से भारत को धक्का लगेगा और वह समझौता करने पर मजबूर होगा। पाकिस्तानी सेना के जनरल ऑफिसर कमांडिंग का आत्म-विश्वास जरूरत से ज्यादा कुलांचे मार रहा था और वह भारत की क्षमता को कम आंक कर चल रहा था। 

घुसपैठिया फोर्स को टास्क फोर्सों में बांटा गया। इनमें पाक अधिकृत कश्मीर की बटालियनों के अफसर और सैनिक ही रखे गए थे ताकि कमांड और को-ऑर्डिनेशन बेहतर हो सके। इस फोर्स में 70 फीसदी रज़ाकार थे जिन्हें अगस्त, 1962 में पाक अधिकृत कश्मीर में तैयार किया गया था। उनमें मूलत: सीमा पर रहने वाले नागरिक थे। उनमें से काफी को नागरिक अधिकारियों ने इस घुसपैठ के लिए जबरन भर्ती किया था। घुसपैठियों को दस बलों में विभाजित किया गया। हरेक बल में पांच-पांच कंपनियों की छह यूनिट थी। हरेक फोर्स का कमांडर पाकिस्तानी सेना का एक मेजर था और हरेक को एक कोड नाम दिया गया था। 

हरेक कम्पनी की कमांड, पाकिस्तानी सेना के एक कैप्टेन के पास थी जो कमांडर कहलाता था। कम्पनी में तीन जूनियर कमीशंड ऑफिसर (जेसीओ), पाक अधिकृत कश्मीर बटालियनों या नॉर्दर्न स्काउट्स के तकरीबन 35 लोग, स्पेशल सर्विस ग्रुप (एसएसजी) के तीन से चार जवान तथा करीब 70 रज़ाकार यानी कुल करीब 120 लोग होते थे। पाक अधिकृत कश्मीर के सैनिकों में से ज्यादातर, कमांडो प्लाटून से ताल्लुक रखते थे और वे कम्पनी के कोर में होते थे जबकि एसएसजी कर्मियों का काम था विध्वंस और तोड़-फोड़ में विस्फोटकों का इस्तेमाल।   
 
रज़ाकारों को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के निकियाल, खुरियत्ता, दरमन, तारकुंडी, बोहरी महल, पीर कलंजार, हजीरा, कोटली और भेर पीओके बटालियनों ने प्रारम्भिक ट्रेनिंग दी थी। इसके बाद उन्हें विभिन्न केंद्रों में, नियमित सैनिकों के साथ कड़ी ट्रेनिंग दी गई। पाक अधिकृत कश्मीर के शिनकियारी, मंग बजरी, डुंगी और सकेसर के गुरिल्ला युद्ध स्कूल में दी गई छह हफ्ते की ट्रेनिंग में, नियमित सैनिकों और रज़ाकारों के बीच के अंतर को दूर करने का काम किया गया। रज़ाकारों की ट्रेनिंग में, घात लगाकर हमला (एम्बुश), पुलों को ध्वस्त करना और संचार लाइनों को काटना, मिलिट्री फॉर्मेशन हेडक्वार्टर तथा सप्लाई डम्प पर हमले करना, दम-खम बढ़ाने की एक्सरसाइज़ और बगैर हथियार के युद्ध जैसे काम शामिल थे।

छोटे हथियारों के अलावा घुसपैठियों के पास निम्नलिखित चीजें और होती थीं - एक फोर्स हेडक्वार्टर पर एक वायरलेस सेट एएनजीआरसी-9। एक कम्पनी के पास एक ब्लेंडिसाइड 83 मिमी रॉकेट लांचर। प्रति कम्पनी 100 राउंड प्लास्टिक विस्फोटक। हरेक सेक्शन के पास एक लाइट मशीनगन। हरेक प्लाटून के पास एक ट्रांजिस्टर। हरेक कम्पनी के पास एक बहुत हल्की पिस्तौल। हरेक कम्पनी के पास तीन 12 बोर की शॉटगन। 

इन सैनिकों को दिए गए इन हथियारों पर आमतौर पर पाकिस्तानी मार्किंग्स नहीं होती थीं। इस फौज के हरेक सदस्य को कोई न कोई हथियार, एम्युनिशन और चार ग्रेनेड दिए गए थे। एम्युनिशन प्रचुर मात्रा में दिया गया था। इसमें हरेक राइफल के साथ 200 राउंड, हरेक स्टेन कार्बाइन के साथ 200-500 राउंड, हरेक लाइट मशीनगन के साथ 750 राउंड दिए गए थे। कुछ कम्पनियों के पास, जरूरत के अनुसार दो या तीन इंच के मॉर्टार भी थे। घुसपैठ कराने के पहले हरेक सदस्य को सिविलियन कपड़े दिए गए थे। इनमें हरी मज़ारी शर्ट और शलवार तथा जंगल बूट शामिल थे। 

युद्ध में ध्वस्त पाकिस्तानी टैंक पर खड़े होकर जवानों का हौसला बढ़ाते तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री। 
घुसपैठ के समय हरेक फौजी को सात दिन का राशन दिया गया। उन्हें फर्जी परिचय-पत्र दिए गए और पर्याप्त भारतीय करेंसी दी गई ताकि जरूरत पड़ने पर वे स्थानीय बाजार से खरीदारी कर सकें। हरेक कम्पनी कमांडर को जरूरी खर्च के लिए 10,000 रुपये दिए गए। इसके सहारे घुसपैठियों के पास, लम्बे समय तक स्थानीय भोजन सामग्री के सहारे काम चलाने की व्यवस्था हो गई। राशन और गोला-बारूद खच्चरों और पोर्टरों पर लादकर लाया गया। युद्ध विराम रेखा के पार घुसपैठियों के समूहों तक राशन और गोला-बारूद की सप्लाई पहुंचाने के लिए, खच्चरों के काफिलों और एयरड्रॉपिंग का इंतज़ाम भी किया गया था। इसके अलावा घुसपैठियों को पाकिस्तान-परस्त स्थानीय लोगों से मदद लेने का और यह सब न होने पर लूटपाट का रास्ता भी था। 

योजना के अनुसार चुनिंदा स्थानों पर एम्युनिशन के डम्प बनाए जाने थे जिनका इस्तेमाल भविष्य में किया जाए। हरेक सैनिक को एक फर्स्ट एड किट दी गई। यह तय किया गया था कि किसी के घायल होने पर उसे हमदर्द परिवारों के पास छोड़ दिया जाएगा। मरने वालों को जंगल में दफना दिया जाएगा। यह मेडिकल योजना अपर्याप्त थी और इससे सैनिकों का मनोबल गिरता था। 

ऑपरेशन का कमांड और कंट्रोल, पाक अधिकृत कश्मीर के जिब्राल्टर फोर्स मुख्यालय के पास था। इस फोर्स हेडक्वार्टर को लम्बी दूरी के संचार के लिए एएनजीआरसी-9 वायरलेस सेट दिया गया था। हरेक प्लाटून के पास ट्रांजिस्टर सेट था। घुसपैठियों को विशेष निर्देश, आज़ाद कश्मीर रेडियो के जरिए विशेष समय पर और विशेष कोड के मार्फत दिए गए। जुलाई 1965 के दूसरे हफ्ते में फोर्स कमांडर मुरी में एकत्र हुए, जिसे राष्ट्रपति अयूब खां ने संबोधित किया। मेजर जनरल अख्तर हुसेन मलिक ने जिन्हें इस ऑपरेशन का काम देखना था 1 अगस्त 1965 को उन्हें संबोधित किया। उन्होंने कहा कि कश्मीर को आज़ाद कराने का यह आखिरी मौका है। 

घुसपैठ के लिए और समूहों के अलावा नुसरत नाम का एक समूह भी बनाया गया जिसमें 350 लोगों के 14 ग्रुप थे। नुसरत दस्ते घुसपैठ के  पहले युद्ध विराम रेखा पर भारतीय सेना को परेशान करने और जिब्राल्टर फोर्स की मदद करने के लिए बनाए गए थे। फोर्स को 1 से 5 अगस्त, 1965 के बीच छोटे-छोटे समूहों में घुसपैठ करनी थी। उन्हें चुनिंदा जगहों पर एकत्र होना था। घाटी में प्रवेश करने के बाद, उन्हें नागरिकों के साथ घुल-मिल जाना था ताकि उन पर ध्यान न जाए। 8 अगस्त, 1965 को उस इलाके में पीर दस्तगीर साहेब का समारोह होने वाला था। श्रीनगर में शेख अब्दुल्ला की पहली गिरफ्तारी के विरोध में राजनीतिक प्रदर्शन, इसके अगले दिन यानी 9 अगस्त को होना था। हमलावरों को काम दिया गया था कि वे  प्रदर्शनकारियों से घुल-मिलकर उन्हें सशस्त्र बगावत के लिए प्रेरित करें और रेडियो स्टेशन, हवाई अड्डे तथा अन्य महत्त्वपूर्ण केंद्रों पर कब्जा करें। इसके साथ-साथ दूसरे दस्तों का काम था- दक्षिण में जम्मू-श्रीनगर मार्ग को और पूर्वोत्तर में करगिल-श्रीनगर मार्ग को ब्लॉक करना ताकि श्रीनगर का सम्पर्क कट जाए। इसके बाद एक क्रांतिकारी परिषद् की घोषणा करने की योजना थी जिसे दूसरे देशों, खास तौर से पाकिस्तानी मान्यता दिलाने के लिए अपील का प्रसारण किया जाए। यह पाकिस्तानी सेना के लिए आगे बढ़कर इस कब्जे को पुख्ता करने का संकेत भी होता। 

स्थानीय जनता को इस ऑपरेशन के लिए तैयार करने के लिए किसी प्रकार का राजनीतिक और खुफिया काम नहीं किया गया था। इस मामले में सारी योजना कमजोर थी। किसी भी कश्मीरी नेता को भरोसे में नहीं लिया गया। स्थानीय जनता ने इनका समर्थन करने के बजाय भारतीय सेना का समर्थन किया। इस खामी की वजह से ऑपरेशन जिब्राल्टर टांय-टांय फिस्स हो गया। इसकी जिम्मेदारी बाद में मेजर जनरल मलिक ने अपने ऊपर ली। 

पाकिस्तानी कार्रवाई शुरू

इन दस्तों को घुसपैठ वाली जगहों तक पहुंचना था इसलिए सारा काम 24 जुलाई, 1965 को शुरू हो गया। ये लोग 5 अगस्त को युद्ध विराम रेखा पर पहुंच गए। शुरू में तकरीबन 1500 लोगों ने, छोटे-छोटे ग्रुपों में सीमा पार की। ये लोग कंजालवान, केरन, टिथवाल, उड़ी, गुलमर्ग, मेंढर, पुंछ, राजौरी, नौशेरा और जम्मू क्षेत्र के दूसरे इलाकों में एकत्र हुए। घुसपैठियों का दूसरा बैच, अगस्त के तीसरे हफ्ते में सीमा पार धकेला गया। इनकी संख्या तकरीबन 6,000 थी। सितम्बर के पहले हफ्ते में तीसरा ग्रुप भी तैयार था जो सीमा पार नहीं कर पाया क्योंकि तब तक भारतीय सेना ने घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी थी। 

घुसपैठियों ने खास इलाकों में छोटे-छोटे समूहों में काम शुरू कर दिया। कुछ घुसपैठिए तो बगैर कुछ किए शुरू में ही वापस चले गए। अलबत्ता ऑपरेशन के कुछ समय बाद, इनमें से कुछ ने कुछ सुदूर पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया। जिब्राल्टर फोर्स राज्य में बगावत भड़काने में नाकामयाब रही। घुसपैठियों में से तकरीबन 1000 मारे गए, काफी भागकर वापस पाकिस्तान चले गए। मध्य अक्तूबर तक 500 से 600 घुसपैठिए ही यहां रह गए थे। इन्होंने कुछ तोड़-फोड़ जरूर की लेकिन अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पाए। 

भारतीय सेना का जवाब

लाहौर के पास बरकी थाना, जिस पर भारतीय फौज ने किया था कब्जा। 
भारतीय सेना के पास इस घुसपैठ की योजना की धुंधली-सी जानकारी थी। पश्चिमी कमांड के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह ने इस बात को पाकिस्तानी योजनाकारों की कुशलता और भारतीय खुफिया नेटवर्क की कमजोरी बताया। भारत तब जागा, जब 5 अगस्त को पश्चिमी गुलमर्ग के गाँव दर्रा कस्सी में अपने जानवरों को चरा रहे, मोहम्मद दीन नाम के एक गुज्जर नौजवान के पास हरा शलवार-कमीज पहने दो लोग आए और उससे भारतीय सेना की तैनाती के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की। युवक ने कुछ कहानी बनाकर उन्हें समझा दिया। इसके बाद उसने तनमर्ग के पुलिस स्टेशन को इस बात की जानकारी दी। सेना का एक गश्ती दल फौरन उस इलाके में भेजा गया। मुठभेड़ के बाद सात घुसपैठिए मारे गए। 

इसके कुछ घंटे बाद मेंढर सेक्टर के गलूथी इलाके में भी वजीर मोहम्मद नामक एक व्यक्ति के पास कुछ घुसपैठिए आए। उसने 120 इनफैंट्री ब्रिगेड हेडक्वार्टर को इसकी जानकारी दी। उसके फौजी दस्ते ने घुसपैठियों को वापस सीमा पार खदेड़ दिया। तीन दिन बाद, 8 अगस्त को नरियान के पास पाक-अधिकृत कश्मीर के दो अफसर पकड़े गए। पूछताछ में उन्होंने ऑपरेशन की जो जानकारी दी, वह विस्मयकारी थी। उनके पास योजना से जुड़े दस्तावेज भी पकड़े गए। पाकिस्तानी घुसपैठिए करगिल से अखनूर तक फैल गए। उन्हें केवल 25 इंनफैंट्री डिवीजन के मंडी, नरियान और बुधिल इलाके में स्थानीय लोगों का समर्थन मिला। उसी दौरान 13 अगस्त को सुबह 6 बजे नौगाम स्थित 8 कुमाऊं बटालियन के बेस पर हमला हुआ। उसमें कमांडिंग अफसर की मृत्यु हो गई और सेकंड इन कमांड घायल हो गया। बहरहाल स्थिति पर जल्द काबू पा लिया गया। अलबत्ता हमलावरों ने एक सैनिक कारवां पर हमला किया। 14 अगस्त को तय किया गया कि घाटी में घुसपैठ का सामना करने के लिए एक अलग हेडक्वार्टर स्थापित किया जाए। मेजर जनरल उमराव सिंह के नेतृत्व में हेडक्वार्टर श्री फोर्स खड़ा किया गया, जबकि हेडक्वार्टर 19 इनफैंट्री डिवीजन को आक्रामक ऑपरेशन की तैयारी के लिए बारामूला भेज दिया गया। 

इस बीच करगिल में, 17 पंजाब ने पॉइंट 13620, ब्लैक रॉक्स और सैडल चोटियों पर कब्जा करके बहुत शानदार काम किया। इन चौकियों पर 14 अगस्त की रात में हमला किया गया और 15 की सुबह कब्जा हो गया। उसी दिन, पाकिस्तानी एयर ऑब्जर्वेशन पोस्ट के निर्देश पर, पाकिस्तानी तोपखाने की गोलाबारी के कारण, देवा स्थित भारतीय चौकी का शस्त्रागार ध्वस्त हो गया। इस हमले में 191 इनफैंट्री ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर बीएफ मास्टर्स की मौत हो गई। 14 फील्ड रेजिमेंट की छह तोपें नष्ट हो गईं। विस्फोट के कारण पालनवाला चौकी को छोड़ना पड़ा। फौरन सेना के कमांडर को एक ब्रिगेडियर, एक इनफैंट्री बटालियन और 26 इनफैंट्री डिवीजन से तोपखाने की एक बैटरी भेजने को कहा गया। उनसे कहा गया कि जिन चौकियों पर घुसपैठियों ने कब्जा किया है, उन्हें फौरन छुड़ाएं। 

भारतीय सैनिकों के लिए जिससे जो बन पड़ा, वह किया। उन्हें लस्सी व पानी पिलाती महिलाएं। 
17 अगस्त को थल सेनाध्यक्ष जेएन चौधरी, कोर कमांडर और दूसरे कमांडरों की बैठक हुई। सेनाध्यक्ष ने कहा कि पाकिस्तान खुला युद्ध छेड़े बगैर घुसपैठ जारी रखेगा। इसलिए, यह तय किया गया कि घाटी में घुसपैठ रोकने के लिए जबर्दस्त कार्रवाई की जाए। हाजी पीर दर्रे पर कब्जा किया जाए। इसके लिए 24 अगस्त से ऑपरेशन शुरू करने की योजना बनाई गई। 25 इनफैंट्री डिवीजन को घुसपैठ वाले रास्तों को बंद करने की जिम्मेदारी दी गई। देवा पर फिर से कब्जा करने योजना बनाई गई। 18 अगस्त, 1965 तक घुसपैठ का असर काफी कम हो गया। 21 अगस्त को 15 कोर कमांडर का अनुमान था कि जम्मू-कश्मीर में घुसपैठियों के छह कॉलम सक्रिय हैं। हरेक कॉलम में आठ कम्पनियां थीं, पर तब तक सभी सक्रिय नहीं थीं। 21 और 22 अगस्त को सेनाध्यक्ष ने निर्देश दिया कि 15 कोर हाजी पीर दर्रे पर कब्जा करे। पश्चिमी कमांड के प्रमुख ले. जन. हरबख्श ने घुसपैठ का बेहतर आकलन किया। उनका विश्लेषण था कि घुसपैठ रोकने के लिए हाजी पीर पर हमला करने और किशनगंगा पार करने की जरूरत है। कोर कमांडर के असमंजस के बावजूद उन्होंने अपनी बात से सेनाध्यक्ष को आश्वस्त करा दिया। इसमें सफलता मिली और 1 सितम्बर के बाद के ऑपरेशन के लिए सैनिकों का मनोबल ऊंचा हो गया।  

सन् 1965 के युद्ध पर ब्रिटिश समीक्षा में कहा गया है कि पाकिस्तान की योजना ऐसे सिक्के पर निर्भर थी जिसके दोनों ओर हेड बना था। पाकिस्तानी जनरलों ने भी स्वीकार किया है कि यह ऑपरेशन विफल था। सिर्फ जम्मू डिवीजन के मंडी इलाके में उसे सफलता मिली जहां घुसपैठियों को स्थानीय जनता का समर्थन मिला। इस ऑपरेशन की धार तभी कम हो गई जब ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम पिछड़ कर 1 सितम्बर तक टल गया। उस समय तक ज्यादातर घुसपैठिए मारे गए। भारतीय सेना ने घुसपैठियों के कब्जे से ज्यादातर जगहों को छुड़ा लिया। ऑपरेशन जिब्राल्टर अपने उद्देश्य में विफल रहा। इसे विफल करने का श्रेय ले.जन. हरबख्श सिंह को दिया जाना चाहिए जिन्होंने स्थिति का सही आकलन किया और उसके हिसाब से जवाब दिया। सन् 1962 के बाद सेना की परीक्षा हुई और वह इसमें सफल साबित हुई।                                                                                                                          
                                                                                                                                                         
ब्रिगेडियर गुरमीत कँवल (सेनि) 
                                                                                                                                                                       
 
मेजर जनरल पीके चक्रवर्ती (सेनि)

(मेजर जनरल पीके चक्रवर्ती (सेनि) आर्टिलरी (ऑपरेशंस) के पूर्व अतिरिक्त डायरेक्टर जनरल हैं और ब्रिगेडियर गुरमीत कँवल (सेनि) क्लॉस नई दिल्ली के पूर्व निदेशक हैं।)
 

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