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बिहार के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है सोनपुर मेला
By मनोज पाठक | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 11/2/2017 4:11:19 PM
बिहार के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है सोनपुर मेला

पटना: मोक्षदायिनी गंगा और गंडक नदी के संगम और बिहार के सारण और वैशाली जिले के सीमा पर ऐतिहासिक, धार्मिक और पौराणिक महत्व वाले सोनपुर क्षेत्र में लगने वाला सोनपुर मेला बिहार के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक महीने से प्रारंभ होकर एक महीने तक चलने वाले इस प्रसिद्घ मेले का उद्घाटन इस साल गुरुवार को होगा। 

प्राचीनकाल से लगने वाले इस मेले का स्वरूप कलांतर में भले ही कुछ बदला हो, लेकिन इसकी महत्ता आज भी वही है। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष लाखों देशी और विदेशी पर्यटक यहां पहुंचते हैं। 

'हरिहर क्षेत्र मेला' और 'छत्तर मेला' के नाम से भी जाने जाना वाला सोनपुर मेले की शुरुआत कब से हुई इसकी कोई निश्चित जानकारी तो उपलब्ध नहीं है, परंतु यह उत्तर वैदिक काल से माना जाता है। महापंडित राहुल सांत्यान ने इसे शुंगकाल का माना है। शुंगकालीन कई पत्थर एवं अन्य अवशेष सोनपुर के कई मठ मंदिरों में उपलब्ध रहे है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थल 'गजेंद्र मोक्ष स्थल' के रूप में भी चर्चित है। 

मान्यता है कि भगवान के दो भक्त हाथी (गज) और मगरमच्छ (ग्राह) के रूप में धरती पर उत्पन्न हुए। कोणाहारा घाट पर जब गज पानी पीने आया तो उसे ग्राह ने मुंह में जकड़ लिया और दोनों में युद्घ प्रारंभ हो गई। कई दिनों तक युद्घ चलता रहा। इस बीच गज जब कमजोर पड़ने लगा तो उसने भगवान विष्णु की प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुदर्शन चक्र चलाकर दोनों के युद्घ को समाप्त कराया। 

इसी स्थान पर दो जानवरों का युद्घ हुआ था इस कारण यहां पशु की खरीददारी को शुभ माना जाता है। इसी स्थान पर हरि (विष्णु) और हर (शिव) का हरिहर मंदिर भी है जहां प्रतिदिन सैकड़ों भक्त श्रद्घा से पहुंचते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान राम ने सीता स्वयंवर में जाते समय किया था। 

हरिहरनाथ मंदिर के पुजारी सुशीलचंद्र शास्त्री आईएएनएस को बताते हैं कि प्राचीन काल में हिंदू धर्म के दो संप्रदायों शैव एवं वैष्णवों में विवाद हुआ करता था, जिसे समाज में संघर्ष एवं तनाव की स्थिति बनी रहती थी। तब, उस समय के प्रबुद्घ जनों के प्रयास से इस स्थल पर एक सम्मेलन आयोजित कर दोनों संप्रदायों में समझौता कराया गया, जिसके परिणाम स्वरूप हरि (विष्णु) एवं हर (शंकर) की संयुक्त रूप से स्थापना कराई गई, जिसे हरिहर क्षेत्र कहा गया। 

हाजीपुर आऱ एनक़ कॉलेज से अवकाश प्राप्त प्रोफेसर नवल किशार श्रीवास्तव आईएएनएस से कहते हैं कि ह्वेनसांग के यात्रा वृतांतों में भी इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। उन्होंने बताया कि इतिहास की पुस्तकों में यह भी प्रमाण मिलता है कि मुगल सम्राट अकबर के प्रधान सेनापति महाराजा मान सिंह ने सोनपुर मेला में आकर शाही सेना के लिए हाथी एवं अस्त्र-शस्त्र की खरीदारी की थी। 

उन्होंने बताया, "एक जमाने में यह मेला जंगी हाथियों का सबसे बड़ा केंद्र था। मौर्य वंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य , मुगल सम्राट अकबर और 1857 के गदर के नायक वीर कुंवर सिह ने भी से यहां हाथियों की खरीददारी की थी।" कहा जाता है कि पहले यह मेला हाजीपुर में लगता था, सिर्फ हरिहर नाथ की पूजा सोनपुर में होती थी। बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश से मेला भी सोनपुर में ही लगने लगा। 

वैसे इस मेले की ख्याति तो पशु मेले के रूप में है परंतु परंतु इस मेले में आमतौर पर सभी प्रकार के सामान मिलते हैं। मेले में जहां देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोग पशु के क्रय-विक्रय के लिए पहुंचते हैं वहीं विदेशी सैलानी भी यहां खींचे चले आते हैं।बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी दो नवंबर को इस मेले का उद्घाटन करेंगे। इस मेले को ऐतिहासिक बनाने में पर्यटन विभाग जुटा हुआ है। करीब एक माह तक चलने वाला यह मेला इस बार 32 दिनों तक चलेगा। 

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मोक्षदायिनी,गंडक,वैशाली,हरिहर,ऐतिहासिक,विदेशी

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