Tuesday 11 August 2020, 08:44 PM
जब नेपाल में जलाया गया महात्मा गांधी का पुतला
By सुशील शर्मा | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 5/26/2020 11:34:13 AM
जब नेपाल में जलाया गया महात्मा गांधी का पुतला
नेपाल का नक्शा

भरोसे लायक पड़ोसी कभी नहीं रहा नेपाल 

भारत में जब आम जनता के बीच नेपाल का जिक्र होता है तो सामान्य हिन्दू नेपाल को अपने धर्म और संस्कृति के काफी करीब समझता है। उसके लिए काठमांडू स्थित पशुपति नाथ मंदिर एक तीर्थस्थल है। वह समझता है कि नेपाली भी हिन्दू हैं अत: वे भाई हैं। भारत के कई रजवाड़ों और नेपाल से शाही व राणा खानदानों के बीच शादियां होती हैं। इन सब बातों से लगता है कि नेपाल बहुसंख्यक हिन्दुओं वाले भारत का स्वाभाविक मित्र देश है। लेकिन वास्तविकता इससे विपरीत है। नेपाल में चाहे राजवंश की सत्ता हो, लोकतांत्रिक या कम्युनिस्टों की सरकारें, हर दौर में नेपाल ने भारत को परेशान करने का काम किया है। जानकारों का मानना है कि पड़ोसी देशों में पाकिस्तान के बाद नेपाल वह दूसरा पड़ोसी देश है जो भारत को सबसे ज्यादा परेशान करता रहा है।

इस लेख में ताजा घटना से लेकर विगत की कई परेशान करने वाली घटनाओं की चर्चा की जा रही है।

धारचूला-लिपुलेख सड़क का विरोध

भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस वर्ष 8 मई को उत्तराखंड में पिथौरागढ़ के करीब धारचूला से लिपुलेख तक 80 कि.मी. लंबी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण एक सड़क का उद्घाटन किया। यह सड़क चीन के साथ युद्ध की स्थिति में सैनिकों और हथियारों को सीमा तक ले जाने के लिए काफी उपयोगी होगी और शांति काल में मानसरोवर जाने वाले

धारचूला-लिपुलेख मार्ग का रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उद्घाटन किया

 

तीर्थ यात्रियों के काम आएगी। इस सड़क के कारण सिक्किम में नाथु ला से मानसरोवर जाने के लंबे रास्ते से मुक्ति मिल जाएगी। इससे पहले गत वर्ष जम्मू-कश्मीर को एक केन्द्र शासित राज्य रुप में गठित करने के बाद भारत ने अपने नए नक्शे में भारत-नेपाल सीमा पर स्थित कालापानी के 330 कि.मी. के क्षेत्र को भारत के हिस्से के रूप में दिखाया था। इस पूरे क्षेत्र पर भारत का 150 साल से अधिक समय से अधिकार रहा है। लेकिन हाल ही में नेपाल की केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी सरकार ने न केवल कालापानी क्षेत्र को नेपाल का हिस्सा बताते हुए भारत से विरोध जताया बल्कि वहां के मंत्रिमंडल ने एक नया नक्शा जारी करते हुए न केवल कालापानी बल्कि लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को नेपाल के नक्शे में दिखाने का काम किया। हकीकत यह है कि अंग्रेजो से पराजय के बाद नेपाल ने 1816 से लागू सुगुआली संधि में स्वीकार किया था कि महाकाली नदी (कालापानी क्षेत्र) के पश्चिमी भाग पर भारत का अधिकार होगा। भारत भी इस संधि को मानता है लेकिन विवाद नदी के वॉटरहैड यानी उद्गम को लेकर है। महाकाली

धारचूला-लिपुलेख मार्ग से मानसरोवर यात्रा सुगम होगी

 

नदी में तीन छोटी नदियों का पानी गिरता है। ये तीन धाराएं हैं- लिम्पियाधुरा, कालापानी धारा और लिपुलेख। भारत का कहना है कि इस नदी का उद्गम लिपुलेख से होता है जो बिल्कुल नेपाल सीमा के करीब है, अत: वहां तक के क्षेत्र पर भारत का अधिकार है। नेपाल का कहना है कि महाकाली का उद्गम लिम्पियाधुरा से है जो भारत की सीमा में काफी अंदर है।

इस समय नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार कई कारणों से काफी अलोकप्रिय हो गई है और जनता में असंतोष है। कोराना वायरस के खिलाफ लड़ाई में नाकामी, गिरती अर्थ व्यवस्था और बेरोजगारी के कारण स्वयं उनकी अपनी नेपाल कम्युनिस्ट पाटी के काफी लोग उनसे नाराज हैं। ओली ने भारत विरोधी कदम उठा कर जनता का विश्वास हासिल करने की चाल चली है लेकिन वह भूल गए कि यदि भारत ने जवाबी कार्रवाई में नेपाल की भारत से लगती सीमा को बंद कर दिया तो नेपाल की क्या हालत होगी। भारत ने 2015 में जब दो महीनों के लिए नेपाल की नाकाबंदी की थी तब नेपाल घुटनों पर आ गया था। भारत की कोशिश है कि अपने पड़ोसी देश के साथ बातचीत के जरिए विवाद का हल निकाला जाए।

नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा ओली

 लिहाजा भारत की ओर से कोई सख्त बयान  नहीं    आया है। जानकारों का मानना है कि सामरिक दृष्टि से महत्पूर्ण धारचूला-लिपुलेख मार्ग के बनने से चीन भी नाराज है और उसने नेपाल को उकसा कर कालापानी क्षेत्र से भारत को हटाने की साजिश की है। लेकिन भारत किसी भी कीमत पर इस इलाके से नहीं हटेगा और यदि नेपाल ने अपनी खुराफातें बंद न की तो उसे इसके नतीजे भी भुगतने पड़ेंगे क्योंकि वह एक लैंड लॉक्ड यानी जमीन से घिरा देश है जिसकी जीवन रेखा भारत से होकर गुजरती है।

सिक्किम विलय के विरोध में जलाया गांधीजी का पुतला

नेपाल की भारत विरोधी कार्रवाइयों और खुराफातों का प्रभावी चित्रण वयोवृद्ध राजनयिक महाराज कृष्ण रसगोत्रा ने अपनी पुस्तक ' अ लाइफ इन डिप्लोमेसी' में किया है। सिक्किम के शासक पाल्देन थांदुप नामग्याल के शासन से परेशान सिक्किम के लोगों ने जनमत में भारत से विलय की इच्छा जताई। इसके बाद 16 मई 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारतीय संसद में पारित एक प्रसाव के बाद सिक्किम का भारत में विलय कर लिया। उस समय नेपाल में भारत के खिलाफ काफी उग्र प्रदर्शन हुए और भारतीय दूतावास व लाइब्रेरी को नुकसान पहुंचाया गया। तब नेपाल में भारत के राजदूत थे महाराज कृष्ण रसगोत्रा जो बाद में विदेश सचिव भी बने। उन्होंने दो-तीन दिन तो कुछ नहीं कहा

वयोवृद्ध राजनयिक महाराज कृष्ण रसगोत्रा

लेकिन जब नेपालियों ने भारतीय दूतावास को घेरते हुए इंदिरा गांधी और जवाहर लाल नेहरू को लेकर मुर्दाबाद के नारे लगाए और फिर महात्मा गांधी का पुतला जलाया तब उनका सब्र जवाब दे गया। दुनिया में नेपाल ही एक मात्र देश है जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का पुतला जलाया गया। हिंसक आंदोलन को चीन और पाकिस्तान के राजनयिक सीधा समर्थन देते हुए देखे गए। गुस्साए रसगोत्रा ने नेपाल के विदेश मंत्री ज्ञानेन्द्र बहादुर कर्की के समक्ष बहुत कड़े शब्दों में विरोध दर्ज किया और चेतावनी देते हुए कहा कि यदि भारत विरोधी आंदोलन तुरंत खत्म नहीं किए गए तो भारत नेपाल के साथ राजनयिक संबंध विच्छेद करने की भी सोच सकता है। उन्होंने कर्की से पूछा कि  सिक्किम के भारत में विलय से नेपाल को क्यों तकलीफ हो रही है? इसका कर्की के पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं था। इस चेतावनी के दो घंटो के भीतर भारत विरोधी आदोलन रुक गया। रसगोत्रा का मानना है कि भारत विरोध के पीछे राजा वीरेन्द्र विक्रम शाह और कम्युनिस्ट विचारधारा के विदेश मंत्री कर्की का हाथ था। रसगोत्रा को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह का पूरा समर्थन था। विरोध स्वरूप राजदूत रसगोत्रा को नेपाल से भारत बुला लिया गया। नेपाल द्वारा बार-बार माफी मांगने और विनय करने के बाद रसगोत्रा को दो महीनों बाद नेपाल भेजा गया।

जब लाल बहादुर शास्त्री का किया अपमान

चीन के खिलाफ 1962 के युद्ध में भारत की पराजय हुई थी। इसके बाद नेपाल ने भारत को अपमानित करना शुरू कर दिया। नेहरू बर्दाश्त करते रहे। प्रधानमंत्री नेहरू ने 1963 में तब उनके मंत्रिमंडल में बिना विभाग के मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को एक सद्भावना यात्रा पर नेपाल भेजा। रसगोत्रा तब काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास में थे। तीन दिन की यात्रा के दौरान नेपाली नेताओं ने शास्त्री जी का बड़ी बेरुखी से स्वागत किया। एक शाम एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का

लाल बहादुर शास्त्री

आयोजन किया गया जिसमें दर्जन भर नेपाली युवक हाथ में नंगी खुखरियां लहराते एक गाने पर नाच रहे थे। नेपाली भाषा में गाए गए उस गाने का अर्थ था, 'एक दिन हम अपनी रक्त रंजित खुखरियों को गंगा में धोएंगे।' शास्त्रीजी नाराज थे, उन्होंने धीरे से रसगोत्रा से कहा कि हमें संदेश मिल गया है और अब चलना चाहिए। रसगोत्रा ने कार्यक्रम का बहिष्कार न करने की सलाह दी जिसे शास्त्री जी मान गए लेकिन नेपाल के प्रति उनका मन काफी खट्टा हो गया था।

बदले हालात देख शास्त्री का किया गुणगान!

मई 1964 को नेहरू का देहांत हो गया और शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री बन गए। अगले ही साल 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ जिसमें भारत विजयी रहा। अब नेपाल का रवैया और सुर काफी बदल गया। नेपाल के तत्कालीन नरेश महेन्द्र ने अपने प्रधानमंत्री डॉ. तुलसी गिरी को दिल्ली भेजा और प्रधानमंत्री शास्त्री को पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक विजय पर बधाई दी और कहा कि वह शास्त्री के हौसले और नेतृत्व की सराहना करते हैं! यह वही राजा महेन्द्र थे जिन्हें नेपाल के राणाओं से बचा कर नेहरू भारत लाए और शरण दी थी। लेकिन राजा महेन्द्र ने हमेशा भारत सरकार के प्रति नकारात्मक रवैया अपनाया जो बाद में राजा वीरेन्द्र और अब कम्युनिस्ट सरकार तक जारी है। राजा महेन्द्र जब कभी

नेपाल का खुखरी डांस

 

भारत यात्रा पर आते, उनका खूब स्वागत होता और वह भी अपनी खुशी व्यक्त करते थे। लेकिन उनकी आदत बन गई थी कि वे मुलाकातों के दौरान भारतीय नेताओं के साथ होने वाली अनौपचारिक वार्ताओँ में, जिनमें कभी विवादित मामलों का जिक्र तक नहीं होता था, वापस जाते समय भारतीय नेतृत्व के नाम एक चिट्ठी छोड़ जाते जिसमें अनौपचारिक वार्ता का हवाला दे कर कई मांगे रख जाते।

यह जानते हुए भी कि चीन और पाकिस्तान, भारत के दुश्मन देश हैं, नेपाल ने हमेशा इन देशों का भारत विरोध में इस्तेमाल किया। नेपाल के बीरगंज क्षेत्र में तो इतने पाकिस्तानी बस गए हैं कि इसे 'लिटल पाकिस्तान' कहा जाता है। इन लोगों में आईएसआई के एजेंट, तस्कर और अपराधी भी हैं। नेपाल हमेशा भारत के खिलाफ तुरुप के पत्ते के रूप

जवाहर लाल नेहरू और नेपाल नरेश महेन्द्र

 

में चीन को आगे करता है लेकिन वह अच्छी तरह जानता है कि एक सीमा से बाहर जाते ही भारत उसकी नाकेबंदी कर देगा। तब न चीन से सीधे कोई सामान नेपाल पहुंच पाएगा और न ही चीन, नेपाल की मदद में भारत से पंगा लेगा। लेकिन नेपाली नेता भारत विरोधी माहौल तैयार कर सत्ता पर काबिज होने की ही राजनीति करते रहे हैं। एक बार स्वयं इंदिरा गांधी ने कहा था कि नेपाल के शासकों पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि वह कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। यही कारण था कि उन्होंने अपने कार्यकाल में नेपाल के प्रति सख्त रुख अपनाए रखा।

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