Tuesday 20 November 2018, 11:41 AM
मोदी ने विदेश नीति में सभी को पीछे छोड़ा : रसगोत्रा
By प्रख्यात राजनयिक महाराज कृष्ण रसगोत्रा | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 10/30/2018 12:11:01 PM
मोदी ने विदेश नीति में सभी को पीछे छोड़ा : रसगोत्रा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ रसगोत्रा जी

प्रख्यात राजनयिक महाराज कृष्ण रसगोत्रा से खास बातचीत (भाग-1)

'हमने चाणक्य का पूरी तरह अनुसरण नहीं किया'

आजादी के बाद से अब तक भारत की विदेश नीति ने कई उतार-चढ़ाव देखे। पंचशील से निर्गुट आंदोलन और उनकी विफलता से लेकर 'लुक ईस्ट' और अब 'एक्ट ईस्ट' नीतियों के इस लंबे दौर में कहां क्या भूल हुई और उन्हें सुधारते हुए आज भारत विश्व मंच पर कैसे एक मजबूत और महत्वपूर्ण राष्ट्र के रूप में उभरा, इसे जानने की ललक हमेशा रहती है। देश के प्रख्यात राजनयिक बल्कि आज भारतीय राजनय के भीष्म पितामह कहे जाने वाले 94 वर्षीय राजनयिक महाराज कृष्ण रसगोत्रा ने 'डिफेंस मॉनिटर' के संपादक सुशील शर्मा को कई महत्वपूर्ण और रोचक बातें बताईं। राजनयिक के साथ ही वे एक अच्छे कवि भी हैं जिनके 1957 में छपे रचना संग्रह 'दो परतें' की भूमिका हरिवंश राय बच्चन ने लिखी थी। प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने अपने राजनयिक जीवन में देश के कई प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया है। क्या हमारी कूटनीति कौटिल्य नीति पर आधारित रही है? पंचशील और गुटनिरपेक्ष रहने की नीतियां तो उनकी नीति से मेल नहीं खातीं। आप का क्या विचार है?

हमने अपनी जरूरतों के मुताबिक चाणक्य नीति का अपनी विदेश नीति में समावेश किया था। चाणक्य शांति को युद्ध पर वरीयता देते थे। हमने इस नीति का पालन किया है। फिर भी, हमें चार युद्ध लड़ने पड़े। हमने युद्ध नहीं छेड़े, हम पर थोपे गए। थोपे इसलिए गए कि हमने दुनिया के समक्ष अपनी जो छवि बनाई, वह ऐसी थी कि लोग समझते थे कि भारतीय भले लोग हैं लेकिन इनका मुल्क कमजोर है। पाकिस्तान का तो यही इरादा था कि हम कश्मीर छीन लेंगे क्योंकि भारत कमजोर है। उसके पीछे अमेरिका और चीन खड़े थे।


पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलान नेहरू के साथ रसगोत्रा (दाएं) 

 

जब चाणक्य यह कहते हैं कि आपका पड़ोसी देश आपका शत्रु होता है लेकिन उसका पड़ोसी देश मित्र होता है। लेकिन हमारे आज के हालात में ऐसा नहीं हुआ क्योंकि नेपाल के साथ हमारे रिश्ते तनाव पूर्ण रहे हैं और नेपाल के पड़ोसी देश चीन से भी हमारी दुश्मनी है। इसी तरह पाकिस्तान हमारा दुश्मन मुल्क है और उसका पड़ोसी देश चीन भी हमारा दुश्मन है। हम तो दुश्मनों से घिरे हुए हैं। ऐसे में चाणक्य का मूल सिद्धांत 'पड़ोसी का पड़ोसी मित्र होता है', हमारे संदर्भ में खरा नहीं उतरता।

हमने चाणक्य का पूरी तरह अनुसरण नहीं किया। उनकी नीति का सिर्फ 50 फीसदी ही अपनाया। वे कहते थे कि राज्य की सुरक्षा सर्वोपरि है। हमने देश की सुरक्षा को गंभीरता से प्राथमिकता नहीं दी। शुरू में तो नेहरूजी सेना को मजबूत करने के पक्ष में थे ही नहीं। वे कहते थे, 'मेरे देश के लोग गरीब हैं। उनका विकास करना चाहता हूं।' यह एक आदर्श उद्देश्य था लेकिन आप देश के प्रधानमंत्री हैं। देश की सुरक्षा आपकी जिम्मेदारी है। आप इसकी अवहेलना नहीं कर सकते। यहां हमारी विदेश और रक्षा नीति गड़बड़ा गई थी। लेकिन 1962 में चीन से पराजय के बाद हमें होश आ गया था।

युद्ध में हार के बाद नेहरूजी ने फौज की संख्या तीन गुना बढ़ा दी थी। रक्षा पर खर्च भी बढ़ाया। जहां से भी हथियार मिले, खरीदे गए। चाणक्य की जो बातें हमें सही लगीं, अपना लिया लेकिन सुरक्षा के मामले में उनकी सीख की अवहेलना की जो गलती थी। इससे पहले 1947-48 में जब कश्मीर हड़पने के लिए पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया, तब भारत का जनरल एक अंग्रेज था रॉय बूचर। उसने नेहरूजी का साथ नहीं दिया। नेहरूजी युद्ध के दौरान पुंछ के इलाके में पाकिस्तान की स्थिति को कमजोर करने के लिए उसे कब्जा करना चाहते थे लेकिन बूचर ने साथ नहीं दिया क्योंकि पाकिस्तान का तत्कालीन जनरल भी एक अंग्रेज था।

सवाल उठता है कि जब आपके पास करियप्पा, थिमैया और मानेकशॉ जैसे जनरल थे तो आपने एक अंग्रेज को जनरल क्यों बनाया?

उस समय पुंछ बल्ज को सीधा कर दिया जाता तो आज कश्मीर में पाकिस्तान की दखलंदाजी संभव नहीं होती। इसी तरह 1965 के युद्ध में पाकिस्तान से जीता हुआ हाजीपीर का इलाका ताशकंद समझौते के तहत लौटा देना एक और बड़ी भूल थी। वर्ना पाकिस्तान की कश्मीर में पैठ हो ही नहीं सकती थी।

प्रख्यात राजनयिक महाराज कृष्ण रसगोत्रा

 

इसी तरह आजादी के 11 वर्षों बाद तक भारतीय नौसेना के प्रमुख अंग्रेज अफसर थे। उन लोगों ने नेवी को मजबूत बनाने में कोई योगदान नहीं दिया। भारत ने अंग्रेजों से एक पनडुब्बी मांगी थी लेकिन उन्होंने देने से मना कर दिया। वाइस एडमिरल रामदास कटारी को 1958 में नौसेना  का चीफ बनाया गया। जब सर्वपल्ली राधाकृष्णन सोवियत संघ में भारत के राजदूत थे, तब एक बार वहां के शासक स्टालिन ने कटाक्ष करते हुए पूछा था, 'क्या भारत की भी कोई नौसेना है?' इस पर राधाकृष्णन ने यह कहते हुए बात संभाली कि अभी हमारा देश नया है। हम नौसेना मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। पर सचाई यह है कि हमारी नौसेना का तब कोई विकास नहीं हो सका था।

जहां तक पंचशील नीति का सवाल है, जिस देश चीन के संदर्भ में यह नीति बनाई गई थी, उसी ने हमारी पीठ में छुरा भोंका और 1962 में हमला कर दिया। रक्षा तैयारियां ठीक नहीं थी इसलिए हम हार हए। गुटनिरपेक्षता की हमारी नीति को भी 1962 के युद्ध में तब गहरा धक्का लगा जब चीन ने हम पर हमला किया और हमने मदद के लिए अमेरिका को पत्र लिख कर दर्जन भर स्क्वाड्रन, एफ-104 और एफ-86 विमानों के, अमेरिकी पायलटों के साथ मांगे। 

अमेरिका ने भारत को एक भी विमान नहीं भेजा लेकिन कुछ छोटे हथियार भेजे थे। इस तरह गुटनिरपेक्षता का दंभ भरते हुए भी हम अमेरिका से मदद मांगने को मजबूर हुए। इस युद्ध से गुटनिरपेक्ष आंदोलन को भारी आघात लगा था। जब 1962 के युद्ध में हम अमेरिका से मदद मांग रहे थे, उस समय अमेरिका और ब्रिटेन हम पर दबाव डाल रहे थे कि हम कश्मीर समस्या पर पाकिस्तान को रियायत दें।

चीनी प्रधानमंत्री झाओ एन लाई के साथ नेहरू 

 

ब्रिटेन के एक मंत्री ने नेहरू से भेंट कर उन पर कश्मीर को लेकर जब काफी दबाव डाला तो नेहरू बिदक गए। उन्होंने अंग्रेज मंत्री को बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया। नेहरू ने इतना जरूर माना था कि कुछ पथरीली पहाड़ियों वाला 1000-1200 कि.मी. का क्षेत्र पाक के लिए छोड़ सकते हैं, इससे ज्यादा नहीं। जब हम जंग लड़ रहे थे, उस समय ब्रिटेन की भूमिका हमारे खिलाफ थी। इस तरह पंचशील और गुटनिरपेक्ष आंदोलन की कहानी खत्म हो गई। जब हम जंग लड़ रहे थे, तब गुटनिरपेक्ष देशों में से किसी ने भी हमारा साथ यह कह कर नहीं दिया कि 'हम तो गुटनिरपेक्ष हैं'। इंडोनेशिया के शासक सुकर्णो ने तो पाकिस्तान की मदद के लिए पनडुब्बियां तक भेज दी थी।

कमोबेश यही स्थिति 1965 और 1971 के युद्ध में भी रही। जब इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध से पहले तत्कालीन सोवियत संघ के साथ मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए, अमेरिकियों ने भारत पर ताने मारने शुरू कर दिए। उन दिनों मैं वाशिंगटन में था। विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह अमेरिका आए थे। उनकी अमेरिकी विदेश मंत्री से मुलाकात हुई। उस समय कक्ष में मैं भी मौजूद था। अमेरिकी विदेश मंत्री किसिंजर ने ताना मारा कि आप तो गुट निरपेक्ष देश हैं, फिर भी सोवियत संघ के साथ संधि कर ली।

इस पर स्वर्ण सिंह ने कहा, 'हां, हमने संधि की है और मेरे प्रधानमंत्री ने मुझे यह अधिकार दिया है कि मैं अमेरिका के साथ भी बिल्कुल वैसी ही संधि करूं। आप बताएं कब संधि करना चाहेंगे?' इस पर अमेरिकी विदेश मंत्री झेंप गए। गुटनिरपेक्ष नीति में औपनिवेशवाद को खत्म करने, पूर्ण निशस्त्रीकरण को बढ़ावा देने और परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबंध लगाने की बात थी।

साठ के दशक में उपनिवेशवाद समाप्त हो गया। परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबंध में आंशिक सफलता मिली और निशस्त्रीकरण में सफलता नहीं मिली। परमाणु हथियारों के निशस्त्रीकरण पर अमेरिका और सोवियत संघ का वर्चस्व था। हमें इसमें कोई भूमिका नहीं निभाने दी गई। जब 1983 में दिल्ली में गुटनिरपेक्ष देशों की बैठक हुई, उस समय मैं विदेश सचिव था। बैठक के चार्टर और घोषणापत्र की जिम्मेदारी भी मेरी थी।

हमने उस बैठक के सिलसिले में तमाम सदस्य देशों के राष्ट्र या शासन प्रमुखों से बातचीत की और कोशिश की कि एजेंडे में आर्थिक सहयोग को भी शामिल करें। जब बैठक हुई तो इस मुद्दे को हटा दिया और फलस्तीन का मुद्दा उठा तथा कुछ और मुद्दों को उठाया गया। फलस्तीन में भारत ने इसरायल के साथ बातचीत के जरिए मुद्दे को सुलझाने की बात की। लेकिन ये देश कश्मीर पर हमारी परेशानियों पर कन्नी काट रहे थे।

तेल निर्यातक मुस्लिम देशों ने ओपेक संगठन बना लिया था। हमने उनसे गुजारिश की कि आप तेल की ज्यादा कीमत उन देशों से लें जो संपन्न हैं, भारत जैसे गरीब देश के लिए कीमतों में कुछ रियायत देनी चाहिए लेकिन उन्होंन यह कहते हुए मना कर दिया कि यह तो व्यापार है। 1965 और 1971 की जंग में भी गुटनिरपेक्ष देशों ने भारत का यह बहाना बनाते हुए साथ नहीं दिया कि वे गुटनिरपेक्ष देश हैं। बेशक वे गुटनिरपेक्ष देश थे लेकिन भारत से तो जुड़े हुए थे। वह दौर भारत के लिए काफी नाजुक दौर था। श्रीमती गांधी भी गुटनिरपेक्ष सदस्य देशों के रवैये से काफी निराश हो गई थीं। उन्हें लगा कि सदस्य देश एजेंडे के प्रति गंभीर नहीं हैं। नया ऐजेंडा कोई होता तो आर्थिक होता लेकिन इस मुद्दे पर ज्यादातर देश अमेरिका को गाली देते थे। लेकिन अमेरिका से गेहूं और अन्य मदद लेने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती था। गुटनिरपेक्ष नीति को पहला धक्का 1962 में चीनी हमले के दौरान लगा। हमने तब अमेरिका से मदद मांगी।

चीन के खिलाफ 1962 के युद्ध के दौरान भारत की विदेश नीति काफी ढुलमुल रही। इसके क्या कारण थे?

उस समय घबराहट वाली विदेश नीति थी। विदेश नीति नेहरू संभाल रहे थे। अमेरिकी राजदूत जे.के. गालब्रेथ की भी बड़ी भूमिका थी। अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी के निजी मित्र एबरल हैरीमन भी भारत आए थे। ब्रिटिश सरकार ने भी अपना एक मंत्री भेजा था। इन दोनों ने नेहरूजी पर कश्मीर को लेकर काफी दबाव डालना शुरू किया। लेकिन 2-3 साल में हम घबराहट की डिप्लोमेसी से बाहर निकल आए थे। रक्षा खर्च बढ़ाया गया। हथियार बनाने की फैक्ट्रियों पर ज्यादा ध्यान दिया गया। वह वक्त बड़ा नाजूक था।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 

 

जब चीनी आ गए तब पंडितजी को हिम्मत दिखानी चाहिए थी। कहते, 'अच्छा तुम आ गए हो, बैठे रहो, कब तक रहोगे'। वे एक महीना भी नहीं टिक सकते थे। वायुसेना से सीमावर्ती दर्रों पर बम गिरा कर बंद करवा देते। देश में उनके खिलाफ गुरिल्ला युद्ध चलाते। चीनियों को भागने का रास्ता नहीं मिलता। सर्दियां शुरू होने वाली थी। पहाड़ों पर बर्फ जम जाती और रास्ते बंद हो जाते तो चीन के लिए मुसीबत खड़ी हो जाती। अमेरिका तो चीन के खिलाफ था ही। लेकिन ब्रिटिश ज्यादा बदमाशी कर रहे थे। बहरहाल, युद्ध खत्म हुआ और चीनी तेजी से लौट गए। लेकिन उस युद्ध से भारत की सैन्य क्षमता कमजोर पड़ी थी। इसलिए सरकार ने तेजी से रक्षा तैयारियां शुरू कर दी।

मोदी ने विदेश नीति में सबको पीछे छोड़ा- मैंने अपनी पुस्तक 'अ लाइफ इन डिप्लोमेसी' में लिखा है, 'अंगेजमेंट विद वन एंड ऑल' यानी 'सभी के साथ व्यवहार करो, संबंध बनाओ'। प्रधानमंत्री मोदी की यह खूबी है कि उन्होंने मेरी पुस्तक आने से पहले ही ठोस कदम उठाना शुरू कर दिया था। पर उन्होंने रूस की अवहेलना करने की गलती कर दी थी लेकिन बाद में स्थिति को संभाल लिया।

कौटिल्य का यह भी कहना था कि स्थिति के मुताबिक कूटनीति में बदलाव किया जाना चाहिए। और हमने ऐसा ही करना शुरू कर दिया था। पहले हमें सोवियत संघ के अलावा और कोई हथियार देने को तैयार नहीं था, हमारी कूटनीति में बदलाव के बाद आज इसरायल, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन आदि तमाम देश रक्षा सामग्री बेचने को तैयार बैठे हैं। मोदीजी ने संयुक्त राष्ट्र के 200 सदस्य देशों में से अधिकतर की यात्रा की है और हर देश के साथ कोई न कोई अर्थपूर्ण समझौता किया है। इससे भारत पर दुनिया का भरोसा बढ़ा है। मोदीजी की तमाम देशों की सफल यात्राओं की तैयारियों में विदेश मंत्रालय का पूरा अमला जुटा रहता है। प्रधानमंत्री के साथ हर यात्रा में विदेश सचिव मौजूद रहते हैं। विदेश सचिव विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त व संयुक्त सचिवों द्वारा जुटाई गई जानकारियों व आंकड़ों से मोदीजी को अवगत कराते रहते हैं। मोदीजी के साथ टीम वर्क के कारण भारत की विदेश नीति का असर दुनिया भर में देखा जा सकता है।

श्री रसगोत्रा के साथ लेखक सुशील शर्मा

 

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। अमेरिका के साथ 2+2 वार्ता में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और अमेरिकी विदेश मंत्री पोंपियो तथा रक्षा मंत्री मैटिस की बैठक के नतीजों का दोनों देशों के सामरिक व कूटनीतिक संबंधों पर सीधा असर पड़ेगा। मोदीजी की विदेश नीति बिल्कुल सही दिशा में जा रही है और यह ऊर्जा और गति से भरपूर नीति है।

मेरे विचार में प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश नीति के मामले में पहले के सभी प्रधानमंत्रियों को पीछे छोड़ दिया है। वह रक्षा तैयारियों पर भी ध्यान दे रहे हैं।मेरे विचार में उन्हें नौसेना पर खर्च और बढ़ाना चाहिए क्योंकि हमारे लिए खतरा उत्तरी सीमाओं से नहीं होगा बल्कि हिन्द महासागर में समुद्री सीमाओं से होगा। हिन्द महासागर में भारत को अपनी नौसेना की ताकत इतनी बढ़ानी चाहिए कि वह इस क्षेत्र में चीन की बढ़त होने ही न दे। चीन को लगे कि हिन्द महासागर में भारत काफी मजबूत है लिहाजा वह लड़ने का विचार ही मन में न लाए।

अक्सर पंडित नेहरू और सरदार पटेल की तुलना की जाती है कि पटेल नेहरूजी के मुकाबले ज्यादा दूरदर्शी थे। उन्होंने 1950 में पंडितजी को एक पत्र लिख कर चीन के प्रति सजग रहने के बारे में चेताया था। इन दोनों की क्षमताओं के बारे में आपके क्या विचार हैं?

जिस पत्र का आप जिक्र कर रहे हैं। उसका मसौदा जानेमाने राजनयिक गिरिजा शंकर वाजपेयी ने लिखा था क्योंकि पटेल विदेशी मामलों के विशेषज्ञ नहीं थे। गिरिजा शंकर वाजपेयी की चीन में भारत के राजदूत के.एम. पनिकर से लगती थी। पटेल ने जब यह पत्र नेहरूजी को भेजा, नेहरूजी समझ गए कि यह गिरिजा वाजपेयी का काम है। उन्होंने पटेल को गोलमोल जवाब दे दिया। इसी दौरान खराब स्वास्थ्य के कारण पटेल की मृत्यु हो गई। देखिए, पटेल ने नए जन्मे एक राष्ट्र को स्थायित्व प्रदान किया और रजवाड़ों को घेर कर देश के एकीकरण में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया।

कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के लिए नेहरूजी की काफी आलोचना होती रही है। क्या उन्होंने ऐसा कर सही किया था?

पंडितजी को हमेशा संयुक्त राष्ट्र पर भरोसा था कि यही संगठन दुनिया में शांति कायम करेगा। वे हमेशा जंग के खिलाफ रहते थे। पाकिस्तान ने कश्मीर के एक हिस्से पर 1947-48 की जंग में कब्जा कर लिया। दोनों ओर के जनरल ब्रिटिश थे।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद़ 

 

उनका सोचना था कि चलो अब पाकिस्तान ने अब कश्मीर में एक रक्षात्मक सीमा बना ली है। शेख अब्दुल्ला भी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को वापस लेने के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में तो पंजाबी रहते हैं, उनको कश्मीर घाटी से दूर ही रखा जाए वर्ना कई दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। मेरे विचार में कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाना कोई बुरी बात नहीं थी। पंडितजी भी सोचते थे कि हमें उनके साथ शांति बनाए रखना चाहिए। दूसरा पहलू यह भी था कि यदि हम जंग बंद नहीं करते और संयुक्त राष्ट्र अपनी फौज भेज देता तो हम क्या करते? सुरक्षा परिषद का रवैया तो भारत के खिलाफ था ही।

कश्मीर समस्या का क्या समाधान नजर आता है?

पंडित नेहरू 1960 में एक बार न्यूयॉर्क आए थे संयुक्त राष्ट्र सत्र में भाग लेने। मैं उनके साथ लेयजन ऑफिसर था। साथ ही आते-जाते थे। पंडितजी नौजवान अधिकारियों से खूब बातें किया करते थे। एक दिन हम दोनों ही कार में पीछे बैठे थे। कश्मीर पर बात चल रही थी। मैंने पूछ, 'कश्मीर की समस्या का हल क्या है?' वह 10-15 सेकेंड चुप रहे और फिर अंग्रेजी में कहा, ‘‘Only Time will tell’’ उनका मानना था कि यथास्थिति बनाए रखनी चाहिए। हमें लगे रहना चाहिए, कश्मीर छोड़ना नहीं चाहिए और वक्त के साथ समस्या का हल निकलेगा। '

जब इसरायल को मान्यता के मुद्दे पर मीडिया को बनाया हथियार!

आपके सेवानिवृत्त होने के बाद सुना है कि इसरायल को मान्यता देने के मुद्दे पर राय लेने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने आपसे बात की थी। क्या हुआ था उस मीटिंग में?

हां, उन्होंने मुझे और कुछ अन्य पूर्व विदेश सचिवों को इसरायल को मान्यता देने के मुद्दे पर सलाह के लिए बुलाया था। उन्होंने पूछा था कि क्या हमें इसरायल को मान्यता देनी चाहिए? उस बैठक में आठ पूर्व विदेश सचिव थे। उनमें से सात ने कहा कि हमें इसरायल को मान्यता देनी चाहिए। हमने कहा कि देखिए, ये तमाम मुस्लिम देश पाकिस्तान के समर्थन में हैं। हमें इनकी परवाह न करते हुए इसरायल से सामान्य संबंध बनाने चाहिए और अपना राजदूत वहां नियुक्त करना चाहिए। हम उन्हें काफी भाव देते हैं लेकिन भारत के प्रति उनका रवैया सकारात्मक नहीं है।

पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के साथ रसगोत्रा 

 

हम आठ में से सात इसरायल को मान्यता दिए जाने पर सहमत थे लेकिन आठवें ने विरोध किया। विरोध करने वाले थे रोमेश भंडारी। वह अरब देशों के बड़े हिमायती थे। उन्होंने कहा कि नहीं हमें ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इसरायल से दूरी रखना हमारी पारंपरागत नीति रही है। नरसिम्हा राव ने भंडारी की दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि बेशक यह हमारी परंपरागत नीति है लेकिन बदलते हालात में हमें अपनी नीति को भी बदलना चाहिए। उन्हीं दिनों लीबिया का विदेश मंत्री चीन की यात्रा से लौटते हुए भारत आया था और उसने बयान दे दिया कि कश्मीर पाकिस्तान को मिलना चाहिए। इसरायल को मान्यता देने के पक्ष वाले हम लोगों ने कहा कि देखिए किस तरह लीबिया का मंत्री हमारे ही देश में कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले करने की मांग कर रहा है।

नरसिम्हा राव ने कहा कि अब बताइए कि आगे बढ़ने का क्या तरीका है? हम में से दो-चार लोगों ने कहा कि हम अखबारों में लेख लिख कर इसरायल को मान्यता देने की जरूरत को रेखांकित करते हुए जोरदार सिफारिश करेंगे। मीडिया में कुछ लोग मेरे पहचान के थे। मैंने उनसे कहा कि वे इस मामले पर संपादकीय लिखें। कुछ और लोगों ने भी लिखा। एक माहौल इसरायल को मान्यता देने के पक्ष में बन गया। हम लोगों ने एक महीने तक लेखों के जरिए विचार दिए कि इसरायल को मान्यता देना किस तरह भारत के हित में होगा। मीडिया में लगातार लेख छपने से ऐसा लगने लगा कि जनता के दबाव में सरकार इसरायल को मान्यता देने पर बाध्य हुई है। ऐसा ही हुआ और नरसिम्हा राव ने इसरायल को मान्यता देकर राजनयिक संबंध स्थापित करने की घोषणा कर दी।

एक अंग्रेजीदां राजनयिक की हिन्दी कविता

सुशील शर्मा

मैं श्री रसगोत्रा (हिन्दी में वह सदैव रसगोत्र लिखते हैं) से मिला, वह अपने अध्ययन कक्ष में एकाकी बैठे थे। उनके सचिव बिज्जु ने मुझे मिलवाया। अभिवादन के बाद, उन्होंने मुझे बैठाया। चाय पीते-पीते बातें करते हुए चाय ठंडी होने लगी। चाय पर मलाई की एक परत चढ़ गई। मेरे मना करने के बावजूद, उन्होंने तुरंत सेवक को बुला कर फिर गरम चाय लाने को कहा। जोर देकर मिल्क केक खिलाया।

इंग्लैंड की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर के साथ रसगोत्रा व उनकी पत्नी कादंबरी 

 

उस दिन उनका व्रत था। स्वयं भी मिल्क केक ही खाया। मैं देख रहा था, मुस्कराहट बिखेर रहे उस चेहरे के पीछे एक उदासी छिपी थी। गत अप्रैल में ही उनकी पत्नी कादंबरी का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। वृद्धावस्था का एकाकीपन चेहरे पर झलक रहा था। अपनी पत्नी की बीमारी और उनके निधन के बारे में बताते हुए उनकी आंखें कुछ ढूंढ़ रही थी। उन्होंने 1957 में अपनी कविताओं का एक संग्रह प्रकाशित करवाया था।

कविता संग्रह की भूमिका हरिवंश राय बच्चन ने लिखी थी जो उन दिनों विदेश मंत्रालय के हिन्दी विभाग में सेवारत थे। दोनों के बीच मित्रता थी। उसी संग्रह से एक कविता जो संभवत: उनकी मौजूदा स्थिति को प्रतिबिंबित करती है,आप भी पढ़िए-


मैं दिन भर करता इंतजार

रजनी आए, निशिकर निकले,

तारों की धुंधली छाओं में

कोई चोरी-चुपके आकर

खटकाए मेरे बंद द्वार

मैं दिन भर करता इंतजार।

वह गई, मुझे जाना होगा:

फिर लौट कहां आना होगा?

यह ज्ञात, न सूखे सत्यों से,

लेकिन, मिलता दिलको करार:

मैं दिन भर करता इंतजार।

यह रात नया क्या लाएगी,

कल रात न जो लेकर आई?

केवल नवीनता भर गम में

फिर कर जाएगी नया प्यार:

मैं दिन भर करता इंतजार।

प्रत्येक दिवस ढल जाने पर

आती है रजनी सज सुंदर;

मैं भी कुछ अश्रु पिरो अपने

योवन का कर लेता सिंगार:

मैं दिन भर करता इंतजार।

मैं किसी तरह दिल के अंदर

ही रख लेता दिल की दिन भर,

पर नहीं निशा के परदे में

रुकता मन में मन का गुबार:

मैं दिन भर करता इंतजार।

कुछ करती मेरा मन हलका,

उसका मन-मोदन हो तो क्या!

उस स्वर्ग बसी तक जाती ही

होगी मेरी आहोपुकार:

मैं दिन भर करता इंतजार।

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