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June 19, 2013
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  • वीरों को सम्मानित करने की प्राचीन है हमारी परंपरा!
  • May 18 2011 1:36:49:360AM
  • by बीडीके ब्यूरो
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  • महाभारत का हीरो अभिमन्यु सात महारथियों से
    अकेले लोहा लेते वीर गति को प्राप्त हुआ।
     

    वीरों को सम्मानित करने की हमारी परंपरा बहुत पुरानी है। जहां सूरमाओं को परमवीर चक्र, अशोक चक्र, महावीर चक्र, कीर्ति चक्र, वीर चक्र और शौर्य चक्र जैसे पदकों से अलंकृत कर युद्ध और शांति काल में बहादुरी के लिए सम्मानित किया जाता है, वैसे ही प्राचीन काल में भी होता था।

    दक्षिण भारत में जहां वीरों की याद में समाधियां बना कर उनके शौर्य का वर्णन किया जाता था, उत्तर भारत में वीरों को जागीरें, पदवी और धन देकर पुरस्कृत किया जाता था। कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में तो इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। शत्रु के राजा को मारने वाले को एक लाख प्राचीन मुद्रा पण, शत्रु के प्रधान सेनापति को मारने पर 50 हजार पण, सेना नायक को मारने पर दस हजार पण, हाथी मारने या शत्रु का रथ ध्वस्त करने पर पांच हजार पण पुरस्कार के रूप में देने का विधान था। शत्रु संहार में नागरिक यदि उल्लेखनीय सहायता करते तो गांव का लगान माफ कर दिया जाता था।

    अंग्रेजों के दौर में विक्टोरिया क्रास सेना में वीरता का सर्वोच्च सम्मान था। वैसे इंग्लैंड में राजशाही असाधारण वीरों को नाइटहुड प्रदान कर सम्मानित करती थी। भारत आजाद होने के बाद 1947 से 1950 के बीच वीरों को सम्मानित करने के लिए पदकों का निर्धारण नहीं हुआ था जबकि 1947-48 में भारत कश्मीर पर पाकिस्तान से पहला युद्ध लड़ चुका था।

    इस युद्ध के वीरों और शहीदों के लिए पुरस्कारों की घोषणा पहले गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 1950 को की गई। इसमें साफ घोषित किया गया और ये अलंकरण 15 अगस्त 1947 से प्रभावी माने गए। शांति काल में असाधारण वीरता के लिए अशोक चक्र, कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र की घोषणा 1952 में हुई। सेना पदक, वायुसेना पदक और नौसेना पदकों की घोषणा 1960 में की गई।

    कोई वीर यदि वीरता की गाथा को दोहराता है तो उसे ‘बार’ दिया जाता है। ‘बार’ का मतलब है दो बार की गई बहादुरी का सम्मान। पदकों के अलावा सैनिकों और अधिकारियों की वर्दी पर बाईं ओर लगे रिबन भी उनकी विशिष्ट योग्यताओं का प्रतीक होते हैं।

    युद्ध काल में वीरता का सर्वोच्च सम्मान परम वीर चक्र है। भारतीय सेना में अब तक 21 बहादुरों को ही यह सम्मान मिल सका है। इनमें से भी 14 को मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया।

    परम वीर चक्र कांसे का बना एक गोलाकार पदक है जिसमें सामने ऋषि दधीचि द्वारा प्रदान अपनी हड्डियों से बने इन्द्र के वज्र के चार निशान होते हैं और बीच में राष्ट्रीय चिन्ह अशोक स्तंभ और सत्य मेव जयते लिखा है। पिछले हिस्से में हिन्दी और अंग्रेजी में परम वीर चक्र लिखा होता है बीच में दो कमल पुष्प हैं। इस पदक का डिजाइन सावित्री बाई नाम की एक महिला ने तैयार किया। वह मूल रूप से स्विट्जरलैंड की थीं लेकिन बाद में सेना के एक अधिकारी से विवाह कर भारतीय हो गईं।

    विड़ंबना यह देखिए कि पहला परम वीर चक्र प्राप्त करने वाले 4 कुमाऊं बटालियन के मेजर सोमनाथ शर्मा सावित्री बाई की बेटी के देवर थे। उन्होंने 1947-48 के युद्ध में पराक्रम दिखाया था। उन्हें शौर्य व बहादुरी का यह पदक मरणोपरांत प्रदान किया गया था।

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