सेना में पिछले कुछ वर्षो से योग्य अधिकारियों की कमी महसूस की जा रही है। कई वर्षों से साल दो बार होने वाले कमांडरों के सम्मेलनों में भी यह मुद्दा उठता रहता है। अब स्थिति यह है कि युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करने वाले विज्ञापन अभियानों के बावजूद थलसेना में 11 हजार 238, वायुसेना में 750 और करीब इतने ही अधिकारियों की नौसेना में कमी है। सशस्त्र सेनाओं में अब युवाओं का आकर्षण कम होने के दो प्रमुख कारण हैं। पहला कारण है-कार्पोरेट सैक्टर में बेहतर वेतन, भत्ते, सेवा शर्ते तथा तेजी से तरक्की के मौके मिलना है। दूसरा कारण है- सेना में जीवन काफी कठिन और जोखिम भरा है। आतंकवाद के इस दौर में शांति काल में भी प्रतिविद्रोहिता व आतकंवाद निरोधक अभियान जारी हैं। युवा वर्ग सेना के प्रति विमुख हो रहा है। वर्ष 2008 में तत्कालीन थलसेनाध्यक्ष जनरल दीपक कपूर ने भी माना था कि सेना को योग्य अधिकारी नहीं मिल रहे। उस साल सैन्य अकादमी में 250 रंगरूट अधिकारियों की रिक्तियां थीं। इन पदों के लिए 148 रंगरूट अधिकारी चुने गए लेकिन इनमें से 62 ने सेना में भर्ती होने से मना कर दिया और निजी क्षेत्र में जाना पसंद किया। इस तरह 250 रिक्तियों में से सिर्फ 86 लोग सैन्य अकादमी में प्रशिक्षण ले रहे हैं।यह स्थिति लगातार बनी हुई है। इस समस्या से निपटने के लिए नागरिकों के लिए सैन्य प्रशिक्षण (कंस्क्रिप्शन) अनिवार्य किए जाने की बात उठी। लेकिन रक्षा मंत्री ए.के.एंटनी ने इस विचार को सिरे से खरिज कर दिया। यूं भी विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए यह कोई उपयोगी विचार नहीं है। जिन देशों में सैन्य प्रशिक्षण अनिवार्य किया भी गया तो वहां काफी समस्याएं पैदा होने लगीं। यहां तक कि मानकों के अभाव में सेना का स्तर और गिर गया। भारत में अब हालात ऐसे बने हुए हैं कि वायुसेना सालाना औसतन 75 पायलट और 25 इंजीनियर वायुसेना को छोड़ कर चले जाते हैं। जाने को बहुत से तैयार बैठे हैं लेकिन वायुसेना की शर्तो को पूरा करने वाले पायलट ही जा सकते हैं। शर्तो में तरक्की के अवसर बाकी न बचना और मानवीय आधार शामिल हैं। पायलटों की कमी दूर करने के लिए वायुसेना ने यहां तक किया कि शॉर्ट सर्विस कमिशन में पायलटों की भर्ती शुरू की। वायुसेना में शामिल होने वाला फ्लाइंग आफिसर या फ्लाइट लेफ्टिनेंट स्तर के पायलट को करीब 25 से 32 हजार रुपये वेतन और भत्ते के रूप में मिलते हैं। जिसमें सात हजार रुपये का फ्लाइंग अलाउंस व अन्य भत्ते भी शामिल है। इसके विपरीत नागरिक उड्डयन के पायलटों को शुरू में ही आसानी से डेढ़ लाख रुपये तक मिल जाते हैं।वायुसेना ही क्यों, नौसेना और तट रक्षक बल से भी पायलट, कुशल व प्रशिक्षित इंजीनियरों तथा अधिकारियों को बाहर ज्यादा वेतन पर नौकरियां मिल रही हैं। गत तीन वर्षो में तीनों सेनाओं के 3060 अधिकारियों ने नौकरी छोड़ने का आवेदन दिया था। करीब 27 हजार जवानों ने भी समय पूर्व सेवानिवृत्ति ले ली। सेना के 600 अधिकारियों को नौकरी छोड़ने की इजाजत नहीं मिली। जहां रक्षा मंत्री ए.के.एंटनी इस समस्या का समाधान छठे वेतन आयोग की सिफारिशों में ढूंढ़ रहे हैं, वहां पूर्व थलसेना जनरल वी.पी.मलिक का कहना है कि छठे वेतन आयोग के अलावा रक्षा मंत्रलय को अधिकारियों की तरक्की में तेजी लानी होगी। कैडर रिव्यू की वर्तमान प्रक्रिया में भी सुधार जरूरी है।
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