गणतंत्र दिवस समारोहों के 61 साल के सफर में कई ऐसी रोचक घटनाएं हुईं हैं जिन्हें इतिहास के पन्ने समोये हुए हैं। विशेषरूप से नई पीढ़ी को पता नहीं होगा कि 26 जनवरी 1950 को पहला गणतंत्र दिवस राजपथ पर नहीं बल्कि इर्विन स्टेडियम (आज का नेशनल स्टेडियम) में मनाया गया था। तब इसकी चारदीवारी नहीं बनी थी और पृष्ठभूमि में पुराना किला नजर आता था। पहला समारोह सवेरे के बजाय दोपहर बाद मनाया गया और पहले राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद गवर्नमेंट हाउस ( आज के राष्ट्रपति भवन) से छह घोड़ों वाली बग्घी में बैठ कर दोपहर ढाई बजे समारोह स्थल के लिए रवाना हुए और कनॉट प्लेस व आस-पास के इलाकों का चक्कर लगाते हुए उनकी सवारी पौने चार बजे सलामी मंच तक पहुंची। उन्हें 31 तोपों की सलामी दी गई। राष्ट्रपति को 31 तोपों की सलामी देने की परंपरा 70 के दशक तक चली। बाद में 21 तोपों की सलामी दिए जाने की परंपरा डाली गई जो आज तक जारी है।
अगले वर्ष से किंग्सवे यानी राजपथ पर समारोह होने लगे ताकि अधिक से अधिक लोग समारोह को देख सकें। उस समय जनपथ का नाम क्विंसवे था। रक्षा जनसंपर्क निदेशालय के पास मौजूद दस्तावेजों और पुराने सैनिक समाचार पत्रिका के अंकों के मुताबिक 1951 के गणतंत्र दिवस समारोह में चार वीरों को वीरता के लिए सर्वोच्च अलंकरण परम वीर चक्र प्रदान किए गए। उस वर्ष से समारोह का समय सुबह के वक्त रखा गया और परेड गोल डाक खाना पर समाप्त हुई थी। लेकिन अगले वर्ष परेड का मार्ग बढ़ा कर पांच मील कर दिया गया। बीटिंग रिट्रीट की परंपरा भी 1952 से शुरू हुई। एक समारोह रीगल सिनेमा के सामने मैदान में और दूसरा लाल किले में हुआ। पहली बार सेना बैंड ने महात्मा गांधी के पसंदीदा गीत ‘अबाइड विद मी’ की धुन बजाई और तब से हर बार यह धुन अवश्य बजाई जाती है।
इससे अगले वर्ष 1953 में में लोक नृत्य और आतिशबाजी को शामिल किया गया। आतिशबाजी रामलीला मैदान में की जाती थी। उसी वर्ष पूवरेत्तर राज्यों-त्रिपुरा, असम और नेफा (अब अरुणाचल प्रदेश) के आदिवासियों को समारोह में आमंत्रित किया गया। राजस्थान के गाड़िया लुहारों ने पहली बार 1955 में समारोह में भाग लिया। इन्हें महाराणा प्रताप के अनुयायी और वीर माना गया। उस वर्ष परेड दो घंटे से ज्यादा चली। एनसीसी गर्ल कैडिटों को पहली बार इस समारोह में भाग लेने का मौका 1954 में मिला। अगले वर्ष 27 जनवरी को पंडित नेहरू ने सफदरजंग हवाई अड्डे पर 200- एनसीसी कैडिटों की रैली की अध्यक्षता की। गणतंत्र दिवस पर मुशायरे की परंपरा 1955 में लाल किले के दीवान -ए-आम में शुरू हुई। मुशायरा रात दस बजे शुरू होता था। अगले वर्ष 14 भाषाओं का कवि सम्मेलन रेडियो से प्रसारित हुआ। लाल किले में मुशायरा और कवि सम्मेलन सुनने वालों की भीड़ इतनी बढ़ गई कि उसे नियंत्रित करने के लिए टिकट लगाया गया। कवि सम्मेलन और मुशायरे में मैथिलि शरण गुप्त, सुमित्र नंदल पंत, महादेवी वर्मा, माखन लाल चतुव्रेदी, भगवती चरण वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर, नरेन्द्र शर्मा,हरिवंश राय बच्चन, अली सरदार जाफरी, मजरूह सुल्तानपुरी, शक़ील बदायूंनी, फिराक़ गोरखपुरी और साहिर लुधियानवी जैसे दिग्गज कवियों व शायरों का समागम हुआ करता था। सन 60 में टिकटों की कीमत पांच रुपये, तीन रुपये और 50 नए पैसे हो गई थी। एक रोचक वाकया 1956 में हुआ। नेफा के एक आदिवासी दल ने राष्ट्रपति को अपनी परंपरा के मुताबिक मानव खोपड़ियों की चार अनुकृतियां भेंट करनी चाही। राष्ट्रपति ने उनके नेता से यह वादा कराने के बाद कि भविष्य में वे मानव शिकार नहीं करेंगे, उनकी भेंट को स्वीकार किया। उसी वर्ष पांच हाथियों को सजा कर परेड में शामिल किया गया। विमानों के शोर से हाथियों के बिदकने की आशंका से सुझाव दिया गया कि हाथियों को परेड में शामिल न किया जाए लेकिन इसे माना नहीं गया। बदलाव यह किया गया कि सेना की टुकड़ियों के गुजरने और लोक नर्तकों की टोली आने से पहले हाथियों को लाया गया। इससे विमानों के आने और हाथियों के जाने के बीच सुरक्षित समय मिल गया। तब हाथियों पर शहनाई वादक बैठाए गए। बहादुर बच्चों को हाथियों पर बैठाने की परंपरा बाद में आरंभ हुई। बहादुर बच्चों को हाथी के हौदे पर बैठा कर परेड में 1960 में लाया गया। हालांकि बहादुर बच्चों को सम्मानित करने की शुरुआत पहले ही हो चुकी थी। समारोह में पांच साल का हाथी का बच्च ‘गोपाला रेड्डी’बिगड़ गया। महावत ने किसी तरह उसे काबू में किया और कोई अनहोनी नहीं हुई। नौ माह की हथिनी ‘उर्वशी’ 1962 की परेड की प्रमुख आकर्षण थी। परेड में नन्हीं ‘उर्वशी’ का महावत दूध की बोतल लिए साथ-साथ चल रहा था!
समारोह में आए दर्शकों का स्वागत हेलीकॉप्टरों से फूल बरसाने की परंपरा 1959 से शुरू हुई जब वायुसेना के हेलीकॉप्टरों ने गेंदे और गुलाब की पंखुड़ियां बरसा कर दर्शकों का स्वागत किया।
सन 1960 में दिल्ली में 20 लाख लोगों ने गणतंत्र दिवस समारोह देखा जिनमें से पांच लाख लोग तो राजपथ पर ही जमा थे। बाकी लोग दिल्ली के जिन इलाकों से परेड गुजरी वहां से इसे देखा। उस जमाने में आतंकवाद का खतरा नहीं था। नेता और जनता के बीच दूरी भी नहीं थी। लोग छतों पर खड़े हो कर बड़े चाव से परेड देखा करते थे। राजपथ पर सुबह चार बजे से लोगों का आना शुरू हो जाता था। सरकारी इमारतों पर रोशनी करने की परंपरा 1958 में शुरू हुई। परेड और बीटींग रिट्रीट समारोह के लिए टिकटों की बिक्री 1962 में शुरू की गई। तब परेड की लंबाई छह मील हो गई थी यानी जब परेड की पहली टुकड़ी लाल किला पहुंच गई तब आखिरी टुकड़ी इंडिया गेट पर ही थी! उसी वर्ष चीनी आक्रमण हुआ लिहाजा अगले वर्ष परेड का आकार कम कर दिया गया। 1963 के समारोह में दिलीप कुमार, तलत महमूद और लता मंगेशकर ने कार्यक्रम पेश कर प्रधानमंत्री कोष के लिए धन जमा किया। चीन के साथ जंग में बहादुरी दिखाने वाले और शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि स्वरूप पंडित नेहरू और मंत्रिमंडल के सदस्यों समेत हजारों लोगों ने राष्ट्रपति मंच के सामने मार्च किया।
पाकिस्तान के साथ 1971 में हुए युद्ध के अगले वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह राजपथ के बजाय विजय चौक पर आयोजित किया गया। उस वर्ष भी राष्ट्रपति को 31 तोपों की सलामी दी गई और बांग्लादेश की आजादी और भारत की विजय का जश्न मनाया गया। 1973 में पहली बार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति पर श्रद्धांजलि अर्पित की। तब से यह परंपरा जारी है।
दिल्ली पुलिस की आईपीएस अधिकारी किरन बेदी ने 1975 की परेड में दिल्ली पुलिस के दस्ते की अगुवाई की। उस दस्ते में सुश्री बेदी के अलावा बाकी सभी का कद छह फुट था!
फ्लाई पास्ट समारोह का प्रमुख आकर्षण होता है। 1968 में 136 विमानों ने फ्लाई पास्ट में भाग लिया। लेकिन 1969 में 164 विमानों ने भाग लिया। उस वर्ष मिग-21 पहली बार राजपथ पर उड़े।
स्वदेशी मुख्य युद्धक टैंक अजरुन पहली बार 1996 में परेड में उतारा गया लेकिन इस वर्ष यह परेड में नहीं होगा। 26 जनवरी 2001 को गुजरात व देश के अन्य भागों में आए भयानक भूकंप से जान-माल की हानि के कारण उस वर्ष पहली बार बीटींग रिट्रीट कार्यक्रम रद्द किया गया। इसी तरह 13 जनवरी 2001 को संसद पर हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ शुरू किए गए ऑपरेशन पराक्रम के कारण 2002 में गणतंत्र दिवस समारोह में सेना की भागीदारी कम कर दी गई थी। तब सेना के घुड़ सवार दस्ते 61 कैवलरी ने भाग लिया था।
पहले पंजाब फिर जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद पनपने और दिल्ली में भी आतंकी हमलों के मद्देनजर गणतंत्र दिवस समारोह के लिए चौकसी कड़ी की जाने लगी। तमाम बंदिशों के कारण राजपथ पर दर्शकों की संख्या में कमी आई। लेकिन पर टीवी पर समारोह को विश्व भर में देखा जा सकता है।
गणतंत्र दिवस समारोहों के कुछ अविस्मरणीय आयाम
- पहला गणतंत्र दिवस समारोह 26 जनवरी 1950 को दोपहर बाद नेशनल स्टेडियम में मनाया गया।
- पृष्ठभूमि में पुराना क़िला नजर आता था।
- 1969 में 164 विमानों ने फ्लाई पास्ट में भाग लिया।
- पहली बार मिग-21 विमानों ने भाग लिया।
- 1971 में पाकिस्तान पर विजय के बाद 1972 में गणतंत्र दिवस समारोह राजघाट के बजाय विजय चौक पर मनाया गया।
- जब नौ माह की हथिनी ‘उर्वशी’ के लिए दूध की बोतल ले कर एक महावत चल रहा था।
- 2001 में भूकंप के कारण बीटींग रिट्रीट कार्यक्रम रद्द किया गया लेकिन परेड चली।
- 1975 में किरन बेदी ने दिल्ली पुलिस दस्ते का नेतृत्व किया।
- दर्शकों पर हेलीकॉप्टर से फूल बरसाने की परंपरा 1959 में शुरू हुई।
- अमर जवान ज्योति पर प्रधानमंत्री द्वारा श्रद्धांजलि देने की परंपरा 1973 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शुरू की।