भारतीय नौसेना बेशक अपनी ताकत में इजाफा करने के लिए छह पनडुब्बियों समेत 34 जहाजों के निर्माण का आर्डर दे चुकी है लेकिन उसके पनडुब्बी बेड़े की ताकत लगातार घट रही है। स्थिति यह है कि इस समय सिर्फ पांच या छह पनडुब्बियां ही समुद्री अभियानों के लिए उपलब्ध हैं। दूसरी ओर चीन,यहां तक कि पाकिस्तान भी अपने पनडुब्बी बेड़े को तेजी से बढ़ा रहा है। मौजूदा 16 पनडुब्बियों में से रूस में बनी फॉक्सट्रॉट क्लास की दो पुरानी पनडुब्बियां वेला और वागली अगले वर्ष तक बेड़े से हटा दी जाएंगी। बाकी बची 14 पनडुब्बियों में से दस रूस में बनी सिंधुघोष क्लास (किलो क्लास) और चार जर्मन एचडीडब्लू शिशुमार क्लास की पनडुब्बियों में से लगभग आधी पनडुब्बियां बंदरगाह पर मरम्मत के लिए किनारे लगी हैं। बाकी सात पनडुब्बियों में से सिर्फ पांच या छह पनडुब्बियां ही समुद्री गश्त और नौसेना अभियानों के लिए उपलब्ध हैं। यदि नई पनडुब्बियां शामिल नहीं हुईं तो 2015 तक पनडुब्बियों का बेड़ा आधा ही रह जाएगा। चीन के दर्जन भर परमाणु पनडुब्बियों समेत 65 और पाकिस्तान के पास आठ पनडुब्बियां हैं। पनडुब्बी बेड़े को सबसे बड़ा झटका फ्रांस से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के तहत देश में बनने वाली छह स्कोर्पिन पनडुब्बियों के प्रोजेक्ट 75 से लगा है। चार साल पहले साढ़े तीन अरब डालर के इस सौदे पर हस्ताक्षर किए गए थे। जानकारों का कहना है कि रूस से विमानवाही पोत के लिए किए गए सौदे की तरह स्कोर्पिन सौदे में भी भारत फंस गया। जैसे रूस ने बांह मरोड़ कर अधिक कीमत वसूली उसी तरह फ्रांस की डीसीएन कंपनी ने भी कीमत बढ़ा कर भारत को संकट में डाल दिया। स्थिति यह है कि प्रोजेक्ट-75 के तहत दिसंबर 2006 को पहली पनडुब्बी के निर्माण का काम मजगांव डॉक में शुरू होना था और पहली पनडुब्बी 2012 तक नौसेना को मिल जानी थी और उसके बाद हर साल एक पनडुब्बी शामिल की जानी थी। इस तरह 2017 तक सभी छह पनडुब्बियां नौसेना में शामिल होनी थी। लेकिन अभी तक स्कोर्पिन पनड़ब्बियों के खोल के निर्माण का काम भी पूरा नहीं हुआ है। फ्रांस की कंपनी ने पुजरे और उपकरणों की कीमतें बढ़ा दी। अब रक्षा मंत्रलय बढ़ी कीमतों पर सामग्री खरीदने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से ङिाझक रहा है। हाल ही में पनडुब्बियों की कमी को लेकर मीडिया में काफी कुछ लिखा गया। रक्षा मामलों की संसदीय समिति की बैठक में भी यह मुद्दा उठा लेकिन आगे कोई प्रगति नहीं हुई। नौसेना के एक पूर्व अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सरकार को सीधे फ्रांस की कंपनी से पनडुब्बियां खरीदने का सौदा करना चाहिए था। देश में असेंबल कर स्वदेशी पनडुब्बी के रूप में प्रचारित करने की जरूरत ही नहीं थी। अब हम फंस गए हैं और फंसे भी 25 साल के लिए क्योंकि इन पनडुब्बियों को नौसेना में इतने समय तक रहना है। तब तक हमें फ्रांस की मदद लेनी ही होगी। नौसेना की 2025 तक की योजना के तहत छह स्कोर्पिन पनडुब्बियों के अलावा दूसरी लाइन की छह और पनडुब्बियां हासिल करनी है। इसके अलावा अरिहंत क्लास की कम से कम तीन परमाणु पनडुब्बियां देश में बनेंगी। रूस से अकूला क्लास की दो पनडुब्बियां लीज पर ली जानी हैं जिनमें से एक इस वर्ष मिलेगी।
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