
अगरतला : त्रिपुरा के दो शाही महलों को संग्रहालय में तब्दील किया जा रहा है, जो अक्टूबर, 1949 में पूर्ववर्ती राजशाही के भारत में विलय से पहले तक सत्ता के केंद्र हुआ करते थे। इन संग्रहालयों में पूर्वोत्तर भारत की कला, संस्कृति, इतिहास एवं जातीय विविधताएं दर्शाई जाएंगी।
त्रिपुरा के सूचना एवं सांस्कृतिक मामलों के मंत्री अनिल सरकार ने आईएएनएस से कहा, "कभी आम लोगों की पहुंच से दूर और कम्युनिस्टों की आंखों की किरकरी रहे महल- पुरान हबेली और उज्जयंता पैलेस- केवल संग्रहालय नहीं होंगे,
बल्कि ज्ञान के केंद्र व भारतीय तथा विदेशी पर्यटकों के लिए पसंदीदा स्थल होंगे।"उन्होंने कहा, "इन संग्रहालयों में देश के पूर्वोत्तर हिस्से में रहने वाली जनजातीय तथा गैर-जनजातीय आबादी की विलुप्तप्राय कला, संस्कृति एवं इतिहास के साथ-साथ जातीय विविधता,
क्षेत्र के पुरातात्विक एवं भूगर्भीय निधि को संरक्षित रखा जाएगा और उन्हें प्रदर्शित किया जाएगा।"अनिल, जो प्रख्यात लेखक और कवि भी हैं, ने कहा, "इन संग्रहालयों में पहाड़ी पूवरेत्तर क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत को सहेजकर रखा जाएगा।
इनका निर्माण 14 करोड़ रुपये की लागत से किया जा रहा है।"पुरान हबेली संग्रहालय का पुनर्नवीनीकरण 3.64 करोड़ रुपये की लागत से किया गया, जिसका उद्घाटन सोमवार को राज्य के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने किया।
लेखक एवं इतिहासकार पन्ना लाल रॉय के अनुसार, पुरान हबेली का निर्माण राजसी राज्य की राजधानी दक्षिणी त्रिपुरा के उदयपुर से पुराने अगरतला ले जाने के बाद हुआ था।रॉय ने बताया, "पुरान हबेली का इस्तेमाल शाही आवास और त्रिपुरा के तत्कालीन राजसी राज्य के प्रशासनिक केंद्र के रूप में 1838 तक किया गया,
जब राजधानी को अगरतला लाया गया।"उज्जयंता पैलेस पिछले साल तक त्रिपुरा विधानसभा का भवन था। इसका निर्माण 1899-1901 के दौरान तत्कालीन महाराजा राधाकिशोर माणिक्य बहादुर ने कराया था।
मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने कहा, "दो मंजिला उज्जयंता पैलेस को पूर्ववर्ती अलगाववादी संगठन ऑल त्रिपुरा ट्राइबल फोर्स (एटीटीएफ) के साथ मार्च, 1993 में हुए समझौते के अनुसार बड़ा संग्रहालय बनाया जा रहा है। इसका निर्धारण एटीटीएफ की पूर्व शर्त के अनुसार पहले ही कर लिया गया था।