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May 25, 2013
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  • भारतीय आगमन दिवस पर नानी सम्मानित
  • Jun 12 2012 9:47:55:717PM
  • by आईएएनएस
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  • भारतीय

    नई दिल्ली : त्रिनिदाद एवं टोबैगो में भारतीयों के आगमन की 167 वीं वर्षगांठ पर एक ऐसी बुजुर्ग प्रवासी भारतीय महिला को सम्मानित किया गया, जिन्हें करीब 100 साल पहले उनकी भारतीय मां ने उस जहाज पर जन्म दिया था, जो भारतीय बंधुआ मजदूरों को लेकर इस द्वीप राष्ट्र की यात्रा पर निकला था।

    समूंदरी दून नामक इस महिला को नानी मां सम्बोधित कर सम्मानित किया गया।त्रिनिदाद एवं टोबैगो में भारतीयों के आगमन को इंडियन एराइवल डे यानि भारतीय आगमन दिवस के तौर पर मनाया जाता है।

    कला एवं बहुसंस्कृतिवाद मामलों के मंत्रालय द्वारा पोर्ट ऑफ स्पेन के नेशनल आर्काइव्स में आयोजित कार्यक्रम में त्रिनिदाद के शिक्षामंत्री डा़ टाइम गूपीसिंह ने दून को एक स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। समारोह के समापन के बाद दून ने कहा कि उनकी ख्वाहिश है भारत की यात्रा करना।

    उनके नाती माइकल सालाजार ने कहा कि भलेही नानी कभी त्रिनिदाद से बाहर नहीं गई, पर वे भारत जाने की ख्वाहिश जाहिर करती रहती हैं।सालाजार ने आईएएनएस को भेजे मेल में लिखा है, "नानी की उम्र भलेही काफी हो चुकी है, पर वे अभी भी सक्रिय और स्वस्थ हैं। वे हर तरह की सब्जी उपजा सकती हैं और आज भी खाना पका सकती हैं।

    उन्हें लोगों से मिलना और उन्हें बीते वक्त की कहानियां सुनाना पसंद हैं।"जब नून की मां मखनी उन्हें अपनी बाहों में समेटे त्रिनिदाद आई थीं तो वे महज 10 दिनों की थीं। समूंदरी का जन्म एसएस मुतलाह नामक उस जहाज पर हुआ था जो भारतीय बंधुआ मजदूरों के एक जत्थे को लेकर त्रिनिदाद जा रहा था।

    उनका समूंदरी नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उनका जन्म समुद्री यात्रा के दौरान हुआ। खराब मौसम और खतरनाक लहरों को झेलते हुए यह जहाज 14 अक्टूबर, 1912 को त्रिनिदाद के नेल्सन द्वीप पर पहुंचा।दुनिया में उपस्थिति जताते ही समूंदरी और उसकी मां को दुर्भाग्य ने जकड़ लिया। उसके पिता बाल मोहोतम इस जहाज पर रसोइया थे।

    यात्रा इतनी जोखिम भरी थी कि उसके असर को उसके पिता झेल नहीं पाये और जहाज पर ही उनकी मौत हो गई। उन्हें रास्ते में भी दफन करना पड़ा। जब मां और बेटी त्रिनिदाद पहुंचीं तो उनकी परवरिश करने वाला कोई नहीं था।

    औपनिवेशिक अधिकारियों ने दोनों को वापस हिंदुस्तान भेजने की योजना बनाई, पर मखनी ने उसी जहाज पर यात्रा कर रहे एक व्यक्ति को अपना जीवन साथ चुनकर समाधान ढूंढ़ लिया।

    मखनी, उनके पति और समूंदरी पेटिट मोर्न इस्टेट में रहने के लिए आ गए। यहां उन्होंने पांच वर्षो तक बंधुआ मजदूर की हैसियत से काम किया।समूंदरी बताती हैं उनकी मां पटना के एक कुर्मी परिवार से थीं, जिन्हें गरीबी ने इस सफर पर निकलने के लिए मजबूर किया था। उनकी मां पटना में बिताये दिनों को याद कर अक्सर भावुक हो जाती थीं। जब समूंदरी 12 साल की हुई तो उनकी शादी दून नामक एक व्यक्ति से हुई।

    उन्होंने दो बेटियों - फिलिस दून द्रुपती और मोनिका जोसेफ बिसन - एवं एक पुत्र को जन्म दिया। बेटे की मौत असमय हो गई। महज 36 साल की उम्र में समूंदरी विधवा हो गईं, पर उन्होंने दून के प्यार को जि़दा रखने के लिए फिर से शादी नहीं की। आज 10 पोता-पोतियों एवं 19 परपोतों-परपोतियों का उनका भरा-पूरा परिवार है।

    सालाजार समूंदरी की बेटी फिलिस के पुत्र हैं और संबंध में वे उनके नाती लगते हैं। हाल तक समूंदरी परिवार की परवरिश के लिए सब्जियों की खेती किया करती थीं, और आज भी उनकी घरेलू सक्रियता बरकरार है।

    काफी खोजबीन के बाद पता चला है कि उनका जन्मदिन 4 अक्टूबर को पड़ता है। सालाजार ने लिखा है, "इस बार हमने नामी का जन्मदिन धूमधाम से मनाने का फैसला किया है।"

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